सारंडा : विकास में शिथिलता, नयी योजना से पांव पसार रहे माओवादी

शैलेश सिंह किरीबुरू : ऑपरेशन एनाकोंडा के बाद करीब सात साल तक शांत बैठे माओवादी अब नयी योजना के तहत सारंडा में अपना पांव तेजी से पसारने लगे हैं. माओवादी विकास में सरकार की शिथिलता को हथियार बनाने में जुटे हैं. संगठन को मजबूत करने के लिये संगठन को छोड़ चुके लोगों से संपर्क साध […]

शैलेश सिंह
किरीबुरू : ऑपरेशन एनाकोंडा के बाद करीब सात साल तक शांत बैठे माओवादी अब नयी योजना के तहत सारंडा में अपना पांव तेजी से पसारने लगे हैं. माओवादी विकास में सरकार की शिथिलता को हथियार बनाने में जुटे हैं.
संगठन को मजबूत करने के लिये संगठन को छोड़ चुके लोगों से संपर्क साध जा रहा है. वहीं यहां सुरक्षा में जुटी पुलिस व सीआरपीएफ भी मान रही है कि जिन अधिकारियों के हाथों में विकास का दायित्व था वे सारंडा को झांकने तक नहीं आये. पिछले दिनों थलकोबाद उपायुक्त ने एक सप्ताह के भीतर थलकोबाद एंव दीघा स्थित सीआरपीएफ कैंप में जनता की सुविधा के लिए प्रज्ञा केंद्र खोलने का निर्देश दिया था. आज तक यह नहीं खुल पाया.
70 हजार की आबादी योजनाओं से वंचित
सारंडा के दीघा में लगभग चार करोड़ की लागत से आइडीसी सेंटर बना. सारंडा के तमाम गांवों को जोड़ने के लिए पीसीसी सड़क का निर्माण (कुछ गांवों को छोड़) हुआ. छोटानागरा में पशु चिकित्सालय, 20 बेड का अस्पताल, पंचायत भवन, बहुद्देशीय भवन (तीनों अपूर्ण), दोदारी में बहुउद्देशीय भवन व अस्पताल, लगभग सात हजार गरीब परिवारों के बीच साइकिल, रेडियो, सोलर लालटेन, इंदिरा आवास, दो सौ हैंड पंप, डीप बोरिंग, वनाधिकार का पट्टा देने आदि समेत अन्य कार्य हुये. अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी सारंडा की लगभग 60-70 हजार जनता को इन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया. गुणवत्ता रहित सड़क बनी. यातायात के लिए वाहन की व्यवस्था नहीं हुई. दीघा स्थित आइडीसी सेंटर में आज तक कोई प्रशासनिक अधिकारी नहीं बैठे.
250 करोड़ के सारंडा एक्शन प्लान का नहीं मिला लाभ
सारंडा के विकास में माओवादियों को बाधक बता रही सरकार अब अपनी कार्य प्रणाली से घिरती नजर आ रही है. 250 करोड़ रुपये की सारंडा एक्शन प्लान ने भले ही विकास की नींव रखी हो. लेकिन इसका लाभ अब तक यहां की आम जनता को पूरा नहीं मिल पाया है.
सरकार ने माओवादियों को खदेड़ने के लिये ऑपरेशन एनाकोंडा चलाया. विकास मे बाधक बने नक्सलियों को हटाने के बावजूद पिछले सात सालों में जनता से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को धरातल पर उतारने के लिए कोई कार्य नहीं किया. इस दौरान सारंडा में माओवादियों का प्रभाव नहीं रहा. उल्टे क्षेत्र की प्रायः खादानों को बंद कर यहां के युवाओं को रोजगार से वंचित कर दिया.

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