जंगल बचा तो बचेगी पहचान: सुंदरपहाड़ी और राजमहल पहाड़ी में आज भी बदलाव की राह देख रहा सौरिया पहाड़िया

आजादी के 79 साल बाद भी झारखंड के सौरिया पहाड़िया समुदाय के जीवन में रोजगार एक बड़ी कमी है. विकास की दस्तक के बावजूद, स्थायी आजीविका का रास्ता धुंधला है, जहां जंगल ही उनके जीवन का आधार है. यह रिपोर्ट उनकी समस्याओं और उम्मीदों को सामने लाती है.

मनोज सिंह की रिपोर्ट गोड्डा: मोबाइल की घंटी पहाड़ तक पहुंच गई, सड़क और बिजली भी आ गई. राशन भी मिलने लगा. लेकिन सौरिया पहाड़िया के घरों में आज भी सबसे बड़ी कमी रोजगार की है. आजादी के 79 साल बाद भी झारखंड के पहाड़ों पर बसे इस कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) की जिंदगी में बुनियादी सुविधाओं की दस्तक तो सुनाई देती है, पर स्थायी आजीविका का रास्ता अब भी धुंधला है. जंगल इनके लिए भोजन, रोजगार, संस्कृति और पहचान का आधार है. यही वजह है कि विकास की उनकी परिभाषा सड़क और बिजली से आगे जाकर ‘जंगल बचाओ, जंगल से आजीविका दो’ पर टिकती है. आज इनका जंगल भी संकट में है. वहां उपजने वाले फल-फूल घट रहे हैं.

इससे चिंतित सौरिया समुदाय का हाल जानने विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर प्रभात खबर के वरीय संवाददाता मनोज सिंह ने सुंदरपहाड़ी (गोड्डा) और राजमहल पहाड़ी (पाकुड़) में सौरिया पहाड़िया परिवारों के बीच एक दिन बिताया. बुजुर्गों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों से बात की, तो एक ही सवाल बार-बार सामने आया. जब आने वाली पीढ़ी को इसी पहाड़ पर रहना है, तो उसके लिए रोजगार, शिक्षा और बेहतर जिंदगी का रास्ता कब बनेगा? सामाजिक कुरीतियों, बाल विवाह, पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्या से कब दूर होंगी ? बुजुर्गों की पीड़ा यह है कि आने वाली पीढ़ियों का वक्त कैसे गुजरेगा और युवाओं का दर्द है कि हालात बदलने में और कितना वक्त लगेगा.

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‘समस्याएं तो बहुत हैं, पर हमारी चिंता पहाड़ है’

सौरिया पहाड़िया समुदाय के लोगों का कहना है कि समस्याएं तो बहुत हैं, पर हमारी चिंता पहाड़ है. पहाड़ ही हमारी पहचान है और जिंदगी से अटूट नाता है. पुरखों की यहां सदियां गुजरीं. इसे छोड़कर कहीं जा नहीं सकते. थोड़ी-सी मदद मिल जाए, तो वनोपज और साग-सब्जियों के सहारे हम आगे बढ़ने का रास्ता तय कर लेंगे. शिक्षा, चिकित्सा और पेयजल की सुविधा भी जरूरी है, पर सरकार और सिस्टम अपने हिसाब से काम करता है. अगर विकास और कल्याण के रास्ते पर विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) सौरिया पहाड़िया को ले जाना चाहते हैं, तो हमारी भावना को समझिए. हमसे इतिहास जुड़ा है. हमारी ऐतिहासिक पहचान है. इसको नष्ट न होने दें.

रेबेदा मालतो पहाड़ पर चलते-चलते कहती हैं कि हमारी पहचान बचनी चाहिए. बारिश के मौसम में एक हाथ में छाता और दूसरे में मोबाइल लेकर खेती-बारी की तैयारियों और वनोपज के बारे में बताती हैं. 'यह बाजरा है, यह मकई, राहड़ (अरहर).' गोड्डा जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर सुंदरपहाड़ी प्रखंड की मुनाडीह की रेबेदा हमसे रूबरू थीं. साथ चल रही दूसरी पहाड़िया महिलाओं के साथ हम भी घने जंगल में थे. रेबेदा बताती हैं कि बरसात में कुरवा (एक प्रकार की खेती) होती है, जिसमें मक्का और दलहन लगाते हैं. अगले साल जरा खेती होती है, जिसमें बरबटी लगायी जाती है. राशन का चावल और जंगल से मिलने वाले साग-पात, फल-फूल ही जीवन का सहारा हैं. समुदाय चाहता है कि जंगल सुरक्षित रहे और आजीविका का रास्ता भी बने.

वन विभाग पर बनाया दबाव, 400 से अधिक प्रकार की चीजें जुटाई

इस इलाके में वर्षों से वन विभाग पारंपरिक पौधे ही लगा रहा था. संस्था अभिव्यक्ति फाउंडेशन के साथ मिलकर पहाड़िया समुदाय ने फलदार पौधे लगाने की मांग की. रांची जाकर वन विभाग के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक रवि रंजन को सुंदरपहाड़ी बुलाया. जंगल से जमा 400 प्रकार की चीजें दिखाकर कहा कि यही हमारा खान-पान है, इसे बचाना जरूरी है. वन विभाग सहमत हुआ और अब उनकी पसंद का जंगल लगाया जाएगा.

मुनाडीह के बैजनाथ पहाड़िया बताते हैं कि इस वर्ष एक नर्सरी तैयार हो रही है. जितने प्रकार के फल-फूल जंगल से मिले हैं, उसी से पौधे तैयार होंगे. कटहल, आम, महुआ, अमरूद और मौसमी साग-सब्जियों के बीज समय पर मिलें, तो मेहनत से आमदनी और खान-पान दोनों का सहारा बन सकता है.

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छठी तक ही है पढ़ाई की व्यवस्था

सुंदरपहाड़ी और राजमहल पहाड़ी के सौरिया पहाड़ियों के बसावट वाले इलाके में छठी कक्षा तक पढ़ाई की व्यवस्था है. हाईस्कूल के लिए 15-20 किलोमीटर तक जाना पड़ता है. इस कारण गांव में शायद ही कोई मैट्रिक पास विद्यार्थी है. पाकुड़ जिले के बड़गम पहाड़ के तीन टोलों में एक भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं है. वहीं, सुंदरपहाड़ी के 33 घर वाले टोले में दो लोगों को सरकारी नौकरी (पहाड़िया बटालियन में) मिली थी. पिछले 10-12 साल से एक भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं है. नकद पैसे के लिए ये लोग जंगलों से जमा लघु वनोपज बेचते हैं. महाजन के लोग आज भी घोड़ा लेकर यहां आते हैं. नकद या खाने-पीने का सामान देकर जाते हैं और उसके बदले वनोपज ले जाते हैं.

बड़गम पहाड़ पर रहने वाले बिजदा पहाड़िया कहते हैं कि राशन में 35 किलो चावल तो मिलता है, लेकिन यह घर-घर नहीं पहुंचाया जाता. पंचायतों में ही रख दिया जाता है. बड़ा कुटलो के ग्रामप्रधान जबरा पहाड़िया कहते हैं कि पानी की दिक्कत है. काफी दूर से पानी लाना पड़ता है. गांव में आजादी के बाद एक भी सरकारी नौकरी नहीं मिली है.

'इनकी लड़ाई जंगल बचाने की है'

राजमहल और सुंदरपहाड़ी में सौरिया पहाड़ियों के बीच काम कर रही संस्था अभिव्यक्ति फाउंडेशन के सचिव कृष्णकांत कहते हैं कि इनकी लड़ाई जंगल बचाने की है. जीवन तो इनका जंगल से चलता है. जंगल में ही इनको आजीविका का साधन चाहिए. वन विभाग के साथ समन्वय बनाकर यह संभव हो पाएगा.

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'पसंद के पौधे लगाने की मांग पर विभाग ने पहल की'

रवि रंजन, अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक, झारखंड कहते है कि सुंदरपहाड़ी में रहने वाले पहाड़िया लोगों ने अपनी पसंद के पौधे लगाने की मांग की थी. इसके बाद विभाग ने पहल करते हुए वैसे पौधों की सूची तैयार करायी है. उसे पाकुड़ और गोड्डा के सभी रेंज में लगाने का आदेश दिया गया है. इसमें पहाड़िया समुदाय की मदद भी ली जा रही है.

'ग्रामीणों की पसंद के हिसाब से होगा पौधारोपण'

बाग पवन शालीग्राम, डीएफओ, गोड्डा कहत है कि वन विभाग ग्रामीणों के साथ मिलकर काम करना चाहता है. उनकी पसंद के हिसाब से ही पौधारोपण होगा. इसकी शुरुआत हुई है. सुंदरपहाड़ी इलाकों के लोग जैसा पौधारोपण चाहते हैं, विभाग सहयोग के लिए तैयार है. ग्रामीणों द्वारा इकट्ठा किए गए बीजों को भी विभाग पौध तैयार करने के लिए इस्तेमाल करेगा.

जानिए सौरिया पहाड़िया का इतिहास

सौरिया पहाड़िया समुदाय का पुराना इतिहास रहा है. द्रविड़ और कर्नाटक के समय से इनके सोन नदी के पास से आने का उल्लेख मिलता है. मेगालिथिक यात्रा में भी इनका जिक्र मिलता है. मालेर और सुर के रूप में इनकी यात्रा का उल्लेख मिलता है. बाद में ये राजमहल हिल्स के आसपास रहे. अलग-अलग समय में राजाओं ने इन्हें अपने साथ रखने की कोशिश की. मुगल साम्राज्य में मानसिंह ने भी इन पर कब्जे की कोशिश की थी. बाद में संधि हुई थी. 1760 के आसपास सभी कोस्ट गार्ड अंग्रेजों को छोड़कर चले गये थे. इसके बाद पहाड़िया लोग अंग्रेजों के ट्रेड रूट की रखवाली करते थे. इसके बदले में उन्हें जमींदारी मिली. 1762 के आसपास पहली बार अंग्रेजों ने इन्हें इंसेंटिव दिया था. बाद में भागलपुर के कमिश्नर ने भी इन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी. उस समय पहाड़िया रेंजर भी बनाया गया था.


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लेखक के बारे में

By अर्चना कुजूर

अर्चना कुजूर एक डिजिटल पत्रकार और कंटेंट राइटर हैं, जो वर्तमान में प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में कार्यरत हैं. वह झारखंड डेस्क के रांची एडिशन के अंतर्गत आने वाले विभिन्न जिलों के साथ-साथ राज्य की प्रमुख राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक और जनसरोकार से जुड़ी खबरों को कवर करती हैं. अर्चना ने वर्ष 2016 में क्राफ्ट फिल्म स्कूल, रोहिणी (नई दिल्ली) से टीवी जर्नलिज्म एंड न्यूज रीडिंग में एक वर्षीय डिप्लोमा किया. इसके बाद उन्होंने नोएडा स्थित नेशनल वॉयस न्यूज और इंडिया वॉयस न्यूज चैनल (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) में इंटर्नशिप करने के साथ-साथ व्यावहारिक पत्रकारिता का अनुभव हासिल किया.

झारखंड लौटने के बाद उन्होंने कशिश न्यूज चैनल में लगभग डेढ़ वर्ष तक आउटपुट विभाग में कॉपी राइटर के रूप में कार्य किया. इसके बाद रांची एक्सप्रेस में एजुकेशन बीट पर रिपोर्टिंग की और प्रिंट पत्रकारिता का अनुभव हासिल किया. वर्ष 2022 से उन्होंने न्यूज11 भारत और नक्षत्र न्यूज चैनल में लगभग दो-दो वर्षों तक डिजिटल कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए राज्य की राजनीति, शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, योजनाओं और समसामयिक विषयों पर हजारों समाचार और विशेष लेख लिखें.

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