सत्ता पाने के लिये सिद्धांतो से समझौता नहीं किया
रविकांत साहूसिमडेगा. बेंजामिन लकड़ा, झारखंड के पूर्व प्रधान महालेखाकार, शिक्षाविद, लेखक और समाजसेवी थे. उनका निधन सेंटेविटा, रांची में शनिवार सुबह 3:30 बजे हुआ. उनका अंतिम संस्कार उनके पैत्रिक गांव कुरडेग के झरैन में रविवार को किया गया. वे केवल एक अफसर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील लेखक और प्रेरक शिक्षक भी थे. उन्होंने 13 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें कविता, कहानियां और सामाजिक जीवन की झलकियां शामिल हैं. उनके लेखन ने युवाओं को प्रेरित किया और जीवन के मूल्यों को समझने में मदद की. 2009 में उन्हें रांची विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त हुई. उनके मार्गदर्शन में कई छात्र-छात्राओं ने यूपीएससी और जेपीएससी जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाएं पास कीं. सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने “बेंजामिन लकड़ा फाउंडेशन” की स्थापना की, जो शिक्षा, उद्योग, कृषि और व्यापार के क्षेत्र में योगदान देने वालों को पहचान और प्रोत्साहन देता है. समाज सेवा के प्रति उनके जुनून ने उन्हें 1986 में “संत इग्नेशियस को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड” की स्थापना के लिए प्रेरित किया, जिसका उद्देश्य वंचित और पिछड़े वर्ग को आर्थिक मजबूती देना था. उन्हें 13 भाषाओं का ज्ञान था, जो उन्होंने नौकरी के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हुए अर्जित किया.
राजनीति में भी उन्होंने कदम रखा, लेकिन अपनी ईमानदारी और सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया. 2009 में कांग्रेस ने उन्हें कोलेबिरा विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया, जहां उन्हें 13,999 वोट मिले. 2014 में वे सिमडेगा से चुनाव लड़े, परंतु केवल 20,601 वोट ही प्राप्त हुए. उनकी ईमानदारी और सिद्धांतों के कारण उन्हें राजनीति में “अनफिट” माना गया, लेकिन उन्होंने कभी सत्ता के लिए अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया.
बेंजामिन लकड़ा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चाई, नैतिकता और सेवा भाव हमेशा सम्मान दिलाते हैं. उनकी तीन बेटियां दीपांती, शिल्पी और श्वेता आज सफल जीवन जी रही हैं, जो उनके संघर्ष और मूल्यों की जीवित मिसाल हैं. उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
