संस्कृति व परंपरा हमारी असली पहचान : विधायक

जेठ जतरा व पथलगढ़ी में झूमे लोग, 13 खोड़ा दलों की प्रस्तुति ने बांधा समां

सिमडेगा. सिमडेगा विधानसभा क्षेत्र के बागेसेरा मलई गांव में जेठ जतरा, पथलगढ़ी, बूढ़ी करम सह सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. मुख्य अतिथि के रूप में जिला कांग्रेस अध्यक्ष सह सिमडेगा विधायक भूषण बाड़ा शामिल हुए. उनके साथ कांग्रेस महिला जिलाध्यक्ष सह जिप सदस्य जोसिमा खाखा उपस्थित थीं. कार्यक्रम का उद्घाटन विधायक भूषण बाड़ा ने किया. इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ जेठ जतरा व पथलगढ़ी कार्यक्रम संपन्न हुआ. मौके पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में 13 खोड़ा दलों ने अपनी आकर्षक प्रस्तुतियों से लोगों का मन मोह लिया. मांदर की थाप, पारंपरिक नृत्य और लोकगीतों पर लोग देर तक झूमते रहे. विधायक भूषण बाड़ा ने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और धार्मिक आस्था हमारी पहचान है. जेठ जतरा जैसे आयोजन समाज को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य करते हैं. उन्होंने कहा कि गांवों की संस्कृति व परंपराओं को बचाये रखना हम सभी की जिम्मेदारी है. आधुनिकता के दौर में भी लोगों का अपनी जड़ों से जुड़े रहना गर्व की बात है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार गांव, गरीब, किसान और आदिवासी समाज की संस्कृति को सहेजने के लिए लगातार कार्य कर रही है. समाज की परंपराएं केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक हैं. विधायक ने युवाओं से अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को आगे बढ़ाने की अपील की. कार्यक्रम में प्रखंड अध्यक्ष विकास कुमार गुप्ता, एससी मोर्चा जिलाध्यक्ष भुनेश्वर राम, मुखिया सुषमा केरकेट्टा, विधायक प्रतिनिधि पुरुषोत्तम कुजूर, विधायक प्रतिनिधि संजय साहू, पंचायत अध्यक्ष विनोद उरांव, घसिया उरांव, आनंद प्रकाश मिंज, लीला उरांव, अमनदीप तिर्की, सोमरा उरांव, जयंती उरांव, प्रदीप उरांव, बसंती उरांव, अनुज उरांव, रूपा उरांव, कलमा लकड़ा, प्रमिला कुमारी, संजय नागरची, रोहित नायक, ऋषि कुमार, घनश्याम उरांव, सुशील लकड़ा, नटवा उरांव आदि उपस्थित थे

आनेवाली पीढ़ियों को परंपराओं से जोड़ना जरूरी : जोसिमा

जोसिमा खाखा ने कहा कि आदिवासी संस्कृति में जल, जंगल व जमीन के संरक्षण का संदेश निहित है. ऐसे आयोजन समाज में भाईचारा, एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करते हैं. उन्होंने कहा कि महिलाओं की भागीदारी और युवाओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि हमारी संस्कृति आज भी जीवंत है. आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपराओं से जोड़ना जरूरी है, ताकि हमारी पहचान और विरासत सुरक्षित रह सके.

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