श्री करंगागुड़ी शिवधाम: आस्था, इतिहास और जन सहयोग का संगम

केरसई प्रखंड में स्थित श्री करंगागुड़ी शिवधाम एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र स्थल है, जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है,

यहां पर मनोकामना लिंग है, 12 अर्घा तक शिव लिंग की खुदाई की गयी थी, कहा जाता है एक काली गाय के स्तन से स्वत: झाड़ी में स्थित शिवलिंग पर दूध गिरता था 1982 से हुई कांवर यात्रा की शुरुआत सोमवार को मेला का आयोजन श्रीश्री 108 श्री करंगागुड़ी शिवधाम के शिवलिंग का इतिहास ढ़ाई सौ साल से पुराना है फोटो:2 एसआईएम: 20- शिवलिंग, 21- करंगागुड़ी मंदिर रविकांत साहू, सिमडेगा केरसई प्रखंड में स्थित श्री करंगागुड़ी शिवधाम एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र स्थल है, जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि जन सहयोग, सेवा और आध्यात्मिकता का जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। यह शिवधाम कुसमाजोर नदी के किनारे, रंगारटोली कुल्लुकेरा पथ के पूर्व दिशा में अवस्थित है. शिवलिंग की उत्पत्ति और रहस्य इस शिवधाम की उत्पत्ति एक रहस्यमयी घटना से जुड़ी है. कहा जाता है कि लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व, एक दिन बादल की तेज गड़गड़ाहट और भूकंप के बाद इस स्थान पर एक शिवलिंग प्रकट हुआ. उस समय के चौथी पीढ़ी के पुजारी स्व. शिलधर प्रधान, जो करंगागुड़ी रेंगार टोली के निवासी थे, को स्वप्न में शिवलिंग के प्रकट होने का संकेत मिला. उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में श्री करंगागुड़ी बाबा की सेवा की और पूजा-अर्चना में समर्पित रहे. इस स्थान की महत्ता तब और बढ़ गयी जब गांव के चरवाहों ने देखा कि एक काली गाय प्रतिदिन झाड़ी में जाकर खड़ी होती है और उसके स्तनों से स्वतः दूध गिरता है। जब ग्रामीणों ने उस स्थान की जांच की, तो वहां शिवलिंग की उपस्थिति पाई गई। इसके बाद गांव में चर्चा शुरू हुई और लोग पूजा-पाठ करने लगे. यह शिवलिंग अत्यंत प्राचीन माना जाता है. ऐतिहासिक प्रमाण शिवधाम की ऐतिहासिकता को 1908 और 1932 के खतियान में भी दर्ज किया गया है. इन दस्तावेजों में शिवलिंग के प्लाट को ‘जंगल झाड़ी’ और बगल के प्लाट को ‘गुड़ी डांड़’ तथा ‘गुड़ी दोन’ लिखा गया है. इससे स्पष्ट होता है कि यह स्थल लंबे समय से धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है. मंदिर निर्माण की शुरुआत शिवलिंग की सुंदरता और महत्ता को देखकर बीरू राजा ने बारह अर्घा तक खुदाई करवाई थी. प्रत्येक अर्घा अत्यंत मनमोहक था. बारहवें अर्घा के बाद खुदाई बंद कर दी गयी और सुरक्षा की दृष्टि से नीचे के अर्घा को ढंक दिया गया। इसके बाद पूजा-अर्चना के लिए ऊपरी अर्घा को व्यवस्थित किया गया. इसी दौरान साधु रामदास जी इस स्थान पर पहुंचे और मंदिर के बगल में बरगद के पेड़ के नीचे कुटिया बनाकर रहने लगे. उन्होंने वर्षों तक करंगागुड़ी बाबा की सेवा की और मंदिर निर्माण की नींव रखी. उनके जाने के बाद भक्त स्व. कल्लुराम कुल्लुकेरिया ने मंदिर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया. जन सहयोग और जमींदारों का योगदान मंदिर निर्माण में स्थानीय ग्रामीणों और जमींदारों का विशेष योगदान रहा. बासेन के जमींदार छतर साय, नटवर साय, जटवर साय, कुल्लुकेरा के गोकुल भान साय, उनकी माता बांगर देवी और पूर्णचंद साय ने बैठक कर मंदिर निर्माण का निर्णय लिया. इसके बाद श्रीश्री 108 ब्रह्मलीन बाबा जयराम प्रपन्नाचार्य जी महाराज, जिन्हें रामरेखा बाबा कहा जाता है, 1972 में शिवलिंग दर्शन के लिए आए और मंदिर की व्यवस्था को संगठित किया. बासेन और कुल्लुकेरा के जमींदारों ने मंदिर के रासभोग के लिए भूमि दान की. ग्राम रेंगार टोली के श्री दिनेश्वर मांझी ने धर्मशाला और भोजनालय निर्माण के लिए 64 एकड़ भूमि दान में दी. जन सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य पूर्ण हुआ और 1982 में रामरेखा बाबा की उपस्थिति में मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुआ. कांवर यात्रा और धार्मिक आयोजन 1982 से त्रिवेणी स्थल से जल लेकर कांवर यात्रा की शुरुआत हुई. उसी वर्ष से सावन मेला का आयोजन भी प्रारंभ हुआ. रामरेखा बाबा ने मंदिर की जिम्मेदारी एक प्रबंध कार्यकारिणी समिति को सौंपी, जिसके संरक्षक कल्लुराम कुल्लुकेरिया बनाये गये. समिति के प्रथम अध्यक्ष हीरानाथ साय थे और ब्रजनाथ मांझी, देवनाथ मांझी, स्व. रामविलास साव जैसे सहयोगी भी जुड़े. मंदिर का विकास मंदिर का विकास क्रमशः होता गया. 1984-85 में प्रवेश द्वार की ओर बरामदा बनाया गया. स्व कल्लुराम कुल्लुकेरिया की धर्मपत्नी रतनी देवी ने उत्तर दिशा की सीढ़ी का निर्माण कराया, जिसका उदघाटन 25 फरवरी 1990 को महाशिवरात्रि के अवसर पर रामरेखा बाबा ने किया. 1992-93 में धर्मशाला का निर्माण हुआ. धार्मिक महत्त्व और वर्तमान आज श्री करंगागुड़ी शिवधाम में महाशिवरात्रि पर भव्य धार्मिक मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं. सावन माह में सोमवारी पूजा और चैत मास में रामनवमी के अवसर पर महावीर झंडा सभी शाखाओं से मंदिर परिसर में आता है. यह स्थल न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है.

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Author: VIKASH NATH

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