जानिए सरायकेला की उस छऊ नृत्यांगना की कहानी, जिसने अपनी कला के दम पर यूरोप तक बनाई पहचान

विश्व आदिवासी दिवस पर जानें सरायकेला की छऊ नृत्यांगना गीतांजलि हेंब्रम की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने अपनी कला से यूरोप में भारत का नाम रोशन किया.

सरायकेला | विश्व आदिवासी दिवस पर जब झारखंड की समृद्ध कला, संस्कृति और परंपराओं की बात होती है, तो सरायकेला की छऊ नृत्यांगना गीतांजलि हेंब्रम का नाम प्रेरणा के रूप में सामने आता है. आदिवासी समुदाय से आने वाली गीतांजलि ने छऊ नृत्य को अपनी पहचान बनाया. इसी कला के जरिए सरायकेला की सांस्कृतिक विरासत को देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक पहुंचाया.सरायकेला की रहने वाली गीतांजलि विदेशों में छऊ नृत्य प्रस्तुत करने वाली आदिवासी समुदाय की पहली महिला कलाकार के रूप में पहचान बना चुकी हैं. यूरोप की धरती पर छऊ की प्रस्तुति देकर उन्होंने झारखंड की संस्कृति और परंपरा का परचम लहराया.

10 साल की उम्र में शुरू हुआ छऊ का सफर

गीतांजलि ने महज 10 वर्ष की उम्र में सरायकेला के राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र से प्रशिक्षण लेना शुरू किया. गुरु तपन पटनायक व गुरु विजय साहू से उन्होंने छऊ नृत्य की बारीकियां सीखीं. बचपन से ही उनका सपना था कि छऊ नृत्य को बड़े मंचों तक पहुंचाया जाए. इसी संकल्प के साथ उन्होंने लगातार अभ्यास किया. राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया.

2018 में यूरोप तक पहुंची सरायकेला छऊ की पहचान

वर्ष 2018 गीतांजलि के छऊ सफर में खास रहा. उन्होंने पद्मश्री पं. गोपाल दुबे के साथ यूरोप के कई शहरों में छऊ नृत्य की प्रस्तुति दी. विदेशी धरती पर सरायकेला की पारंपरिक कला को प्रस्तुत करना उनके लिए गौरव का क्षण था. छऊ के जरिए उन्होंने झारखंड की संस्कृति, परंपरा और कला की समृद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का काम किया.

पुरुष हो या महिला, हर किरदार में दिखाती हैं अपनी कला

गीतांजलि की खासियत यह है कि वह छऊ नृत्य में पुरुष और महिला दोनों किरदारों को बखूबी निभाती हैं. देवदासी और गीतांजलि उनका पसंदीदा नृत्य है. इसके अलावा राधा-कृष्ण, वर्षा-झमझम, नाविक और रात्रि सहित कई प्रस्तुतियों में वह अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं. उन्होंने सरायकेला के अलावा ओड़िशा, बेंगलुरु, हरियाणा, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और दिल्ली समेत देश के विभिन्न राज्यों में बड़े मंचों पर प्रस्तुति दी है.

शादी के बाद भी नहीं टूटा छऊ से रिश्ता

शादी के बाद बेंगलुरु में रहने के दौरान भी गीतांजलि ने छऊ नृत्य का अभ्यास जारी रखा. वहां उन्होंने पद्मश्री पं. गोपाल दुबे से छऊ की विभिन्न विधाओं की जानकारी ली और उनके साथ देश के कई शहरों में प्रस्तुतियां दीं. वर्तमान में वह जमशेदपुर में रहकर छऊ नृत्य कर रही हैं और नई पीढ़ी को भी इस पारंपरिक कला का प्रशिक्षण दे रही हैं.दो बच्चों की मां गीतांजलि का मानना है कि मन में दृढ़ संकल्प हो तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. उनके लिए छऊ नृत्य केवल नृत्य की एक विधा नहीं, बल्कि सरायकेला की संस्कृति और परंपरा से जुड़ी पहचान है.

आदिवासी महिलाओं को आगे आने का दे रहीं संदेश

वह आदिवासी महिलाओं को भी अपनी कला और प्रतिभा के साथ आगे आने का संदेश देती हैं. उनका मानना है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से आदिवासी संस्कृति और छऊ को नई ऊंचाई मिल सकती है. विश्व आदिवासी दिवस पर गीतांजलि हेंब्रम की कहानी उन युवतियों के लिए प्रेरणा है, जो अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाते हुए कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना चाहती हैं.

सरायकेला की यह बेटी छऊ के माध्यम से आदिवासी संस्कृति की जड़ों को मजबूत करते हुए उसे देश और दुनिया तक पहुंचाने में जुटी है.


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लेखक के बारे में

By शचिंद्र कुमार दाश

शचिंद्र कुमार दाश प्रभात खबर के वरीय संवाददाता हैं और हिंदी पत्रकारिता में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वे झारखंड और ओडिशा की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, कानून-व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके साथ ही कला, भाषा, संस्कृति, आध्यात्म और समसामयिक विषयों पर लेखन में उनकी विशेष रुचि है। नई जानकारियां जुटाना और उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के साथ पाठकों तक पहुंचाना उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, खेल, पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति से जुड़े विषयों को समेटती है। शचिंद्र कुमार दाश ग्राउंड रिपोर्टिंग पर विशेष जोर देते हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचकर तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करते हैं।

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