सरायकेला छऊ के मुखौटे से मिली पहचान, महापात्र परिवार पीढ़ियों से सहेज रहा विरासत

Saraikela Kharsawan News: सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में मुखौटा इसकी पहचान है, जिसकी शुरुआत गुरु प्रसन्न महापात्र ने की थी. उनकी परंपरा को अब तीसरी पीढ़ी आगे बढ़ा रही है. देश-विदेश में प्रसिद्ध इस कला के बावजूद परिवार को अब तक सरकारी सम्मान नहीं मिलने का मलाल है.

सरायकेला से शचिंद्र कुमार दाश की रिपोर्ट 

Saraikela Kharsawan News: विश्व प्रसिद्ध सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में मुखौटा का विशेष महत्व है. मुखौटा से ही सरायकेला शैली के छऊ को चार चांद लगा है. कहा जाता है कि शुरुआत के समय में सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में मुखौटा का उपयोग नहीं होता था. लगभग सौ साल पहले सरायकेला के गुरु प्रशन्न महापात्र ने सरायकेला शैली के छऊ नृत्य के लिए मुखौटा तैयार कर इसे नृत्य में समाहित किया. इसके बाद से ही सरायकेला शैली के छऊ की लोकप्रियता बढ़ी. आधुनिक मुखौटे से ही सरायकेला शैली के छऊ को एक अलग पहचान मिली. सरायकेला के गुरु प्रसन्न महापात्र का परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी सरायकेला शैली छऊ नृत्य के लिए मुखौटा तैयार कर विरासत में मिली इस कला को आगे बढ़ रहा है. गुरु प्रशन्न महापात्र के बाद उनके भतीजे सुशांत कुमार महापात्र ने इस कला को आगे बढ़ाने का कार्य किया. अब तीसरी पीढ़ी में सुशांत कुमार महापात्र के पूत्र सुमित महापात्र भी छऊ मुखौटा तैयार कर रहे है. 

आठ साल से मुखौटा बना रहे गुरु सुशांत महापात्र 

सरायकेला के प्रथम मुखौटा निर्माता गुरु स्व प्रसन्न महापात्र के भतीजा सुशांत महापात्र आठ साल से ही अपने पिता के साथ मुखौटा का निर्माण शुरू कर दिया था. सुशांत महापात्र ने बताया कि पहले जहां बांस की टोकरी एवं अन्य साधनों को मुखौटा के रूप में प्रयोग किया जाता था. उस दौरान 1925 में उनके बड़े पिताजी प्रशन्न कुमार महापात्र ने मिट्टी से आधुनिक मुखौटा तैयार कर सरायकेला शैली छऊ में शामिल कराया. इसके बाद इस मुखौटा का प्रचलन बढ़ने लगा और अब यही मुखौटा का सरायकेला शैली छऊ नृत्य की पहचान बन गई है. उनके द्वारा तैयार किए गए सरायकेला शैली छऊ मुखौटा का प्रदर्शन सिर्फ देश ही नही अपितु सात समंदर पार अमेरिका के न्युआर्क, बर्लिन, वियाना, देश के दिल्ली, मुंबई, कोलकाता सहित अन्य बडे शहरों में मुखौटा  का प्रदर्शन किया जा चुका है. विदेशों में इस कला को जानने के लिए लोगों में काफी उत्सुकता देखी जाती है. छऊ कलाकारों को भी विदेशों में काफी सम्मान मिलता है. प्रदर्शनी के दौरान कई देशों में लोग मुखौटा को खरीद कर अपने घरों में लगाने के लिए ले जाते है.

सरायकेला छऊ नृत्य के लिये मुखौटा बनाने वाले शिल्प कौशल गुरु प्रशन्न महापात्र (अब स्वर्गीय)

अब मुखौटा निर्माण कला को आगे बढ़ा रहे हैं सुमित महापात्र

बिरासत में मिली मुखौटा निर्माण कला को महापात्र परिवार के तीसरी पीढ़ी के सुमित महापात्र अब आगे बढ़ा रहे है. 35 वर्षीय सुमित महापात्र बताते हैं कि पांच वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता सुशांत महापात्र से मुखौटा निर्माण के साथ साथ साथ छऊ नृत्य भी सीखने लगे थे. सुमित के तैयार किए हुए मुखौटे अब देश-विदेश में धूम मचा रहे है. सुमित के तैयार मुखौटे प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक को भेंट की गई है. उन्होंने बताया कि भले ही मुखौटा निर्माण की कला से अधिक रोजगार नहीं मिलती हो, लेकिन कहा कि विरासत में मिली इस कला को बचाए रखने की चाहत ने ही कला से जोड़े रखा है. सुमित की इच्छा है कि विरासत में मिली इस आगे को उनका परिवार आगे भी बढ़ाता रहे.  

सरायकेला शैली के छऊ मुखौटा बनाने गुरु सुशांत महापात्र

सरकारी सम्मान नहीं मिलने का है मलाल

महापात्र परिवार को इस बात का मलाल है कि सरायकेला छऊ की शान में चार चांद लगाने वाले मुखौटा के जनक को अब तक सरकारी स्तर पर कोई सम्मान नहीं मिल पाया. सरायकेला शैली छऊ नृत्य के प्रथम मुखौटा निर्माता गुरु स्व प्रसन्न महापात्र को जीवंत या मरणोपरांत इस कला के लिए सरकार से उन्हें कोई सम्मान नहीं मिला. यह मुखौटा ही है जिसके चलते सरायकेला छऊ पूरे विश्व में एक अलग पहचान बनाई है.

सरायकेला में छऊ मुखौटा बनाने की कला सिखते बच्चे

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By Priya Gupta

प्रिया गुप्ता प्रभात खबर के लाइफस्टाइल बीट पर 1 साल से काम कर रही हैं. यहां वे हेल्थ, फैशन और भी ट्रेंड से जुड़ी आर्टिकल लिखती हैं. ये हर लेख को दिल से लिखती है, जो पाठकों को सिर्फ जानकारी नहीं, एक एहसास पहुंचा सकें.

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