मां पाउड़ी को अर्पित हुआ नये धान का पहला अन्न, खरसावां के कुम्हारसाही स्थित शक्ति पीठ में हुई नुआखाई जंताल पूजा, जानें क्या है परंपरा

खरसावां के पाउड़ी शक्ति पीठ में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ वार्षिक नुआखाई जंताल पूजा संपन्न हुई. सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, नए धान का पहला भोग मां पाउड़ी को अर्पित किया गया. यह पर्व कृषि संस्कृति और लोक आस्था का प्रतीक है.

खरसावां : खेतों में लहलहाती नयी फसल, घरों में तैयार हुआ नये धान का चावल और मां पाउड़ी के चरणों में सबसे पहले अर्पित होता नवान्न. इसी आस्था और कृषि संस्कृति के अद्भुत संगम का साक्षी बुधवार को खरसावां का कुम्हारसाही स्थित पाउड़ी शक्ति पीठ बना. यहां वार्षिक नुआखाई जंताल पूजा श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ संपन्न हुई. सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार इस वर्ष तैयार हुए नये धान से बने चावल का पहला भोग शक्ति की देवी मां पाउड़ी को अर्पित किया गया. इसके बाद ही नये अन्न को ग्रहण करने की परंपरा निभायी गयी.

विधि-विधान से मां पाउड़ी की आराधना

पूजा की शुरुआत देउरी शुकरा नायक ने विधि-विधान से मां पाउड़ी की आराधना कर की. पूजा में क्षेत्र की सुख-शांति, समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की गयी. दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में माथा टेका और अपनी मन्नतें मांगीं. मन्नत पूरी होने पर भक्तों ने चढ़ावा अर्पित किया. कई श्रद्धालुओं ने मिट्टी से बने हाथी और घोड़े मां पाउड़ी को भेंट किये. इस दौरान आठ बकरे और भेड़ों की पूजा भी की गयी.

नये अन्न पर पहले देवी का अधिकार

नुआखाई जंताल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि खरसावां की कृषि संस्कृति और लोक आस्था का महत्वपूर्ण पर्व है. खेतों में तैयार नयी फसल को किसान अपनी मेहनत और प्रकृति के आशीर्वाद का प्रतीक मानते हैं. इसलिए घर में नये चावल के पहुंचने से पहले उसे मां पाउड़ी को अर्पित करने की परंपरा निभायी जाती है. यह मान्यता प्रकृति, कृषि और देवी आराधना के बीच के गहरे संबंध को दर्शाती है.

17वीं सदी से कायम है परंपरा

मां पाउड़ी के इस शक्ति पीठ में नुआखाई जंताल पूजा की परंपरा 17वीं सदी से चली आ रही है. पहले इसका आयोजन खरसावां राज परिवार की ओर से किया जाता था. अब प्रशासन की देखरेख में पूजा संपन्न होती है. मां पाउड़ी को माता भगवती का स्वरूप माना जाता है और देउरी यानी भुईयां समाज के लोग पारंपरिक रूप से पूजा-अर्चना कराते हैं. प्रत्येक सप्ताह गुरुवार को भी यहां माता की पूजा होती है. गणेश चतुर्थी के दो दिन बाद षष्ठी तिथि को होने वाला नुआखाई जंताल यहां का सबसे बड़ा वार्षिक धार्मिक आयोजन माना जाता है. बदलते समय के बीच यह परंपरा आज भी खरसावां की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाये हुए है.

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By शचिंद्र कुमार दाश

शचिंद्र कुमार दाश प्रभात खबर के वरीय संवाददाता हैं और हिंदी पत्रकारिता में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वे झारखंड और ओडिशा की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, कानून-व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके साथ ही कला, भाषा, संस्कृति, आध्यात्म और समसामयिक विषयों पर लेखन में उनकी विशेष रुचि है। नई जानकारियां जुटाना और उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के साथ पाठकों तक पहुंचाना उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, खेल, पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति से जुड़े विषयों को समेटती है। शचिंद्र कुमार दाश ग्राउंड रिपोर्टिंग पर विशेष जोर देते हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचकर तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करते हैं।

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