खरसावां में भगवान जगन्नाथ को चढ़ी दशमूल औषधि, नेत्र उत्सव तक चलेगा उपचार

स्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों के जल से महास्नान के बाद अस्वस्थ हुए प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का इन दिनों मंदिर के अणवसर गृह में गुप्त सेवा के बीच उपचार हो रहा है. खरसावां की प्राचीन परंपरा के अनुसार, जंगल की दुर्लभ जड़ी-बूटियों से तैयार दशमूल औषधि प्रभु को अर्पित की गई है. मान्यता है कि इसके सेवन से प्रभु के स्वास्थ्य में सुधार होता है. पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद 14 जुलाई को नेत्र उत्सव पर वे भक्तों को नव यौवन स्वरूप में दर्शन देंगे.

खरसावां : स्नान पूर्णिमा (29 जून) पर 108 कलशों के पवित्र जल से महास्नान के बाद अस्वस्थ हुए प्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का इन दिनों मंदिर के अणवसर गृह में गुप्त सेवा के बीच उपचार हो रहा है. परंपरा के अनुसार शुक्रवार को अणवसर दशमी के दिन खरसावां के जगन्नाथ मंदिर में विशेष रुप से तैयार दशमूली दवा प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा को अर्पित किया गया.

अणवसर दशमी पर भगवान को अर्पित की गई दशमूल औषधि

खरसावां की प्राचीन परंपरा के अनुसार अणवसर दशमी पर भगवान को जंगल की दस दुर्लभ जड़ी-बूटियों से तैयार दशमूल औषधि अर्पित की जाएगी. मान्यता है कि इस औषधि के सेवन के बाद प्रभु के स्वास्थ्य में सुधार होने लगता है. पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद 14 जुलाई को नेत्र उत्सव पर भगवान नव यौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे, जबकि 16 जुलाई को भव्य रथयात्रा में रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे.

अणवसर काल में नहीं होता है भगवान जगन्नाथ के दर्शन

अणवसर काल के दौरान भगवान सार्वजनिक दर्शन नहीं देते. इस अवधि में सेवायत विशेष धार्मिक परंपराओं के अनुसार प्रभु की गुप्त सेवा करते है. साथ ही जड़ी-बुटी से उपचार किया जाता है. इस दौरान सिर्फ फल-मूल का भी भोग अर्पित की जाती है. इस अनूठी परंपरा को हर साल स्नान पूर्णिमा से लेकर नेत्र उत्सव तक निभाया जाता है.

दशकों से पीढ़ी दर पीढ़ी दवा तैयार कर रहा राजवैद्य परिवार

भगवान जगन्नाथ के लिए तैयार होने वाली दशमूल औषधि खरसावां के कुम्हारसाही स्थित दाश परिवार द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी तैयार की जा रही है. लगभग 200 वर्षों से अधिक समय से राजवैद्य परिवार इस सेवा से जुड़ा हुआ है. पहले दाशरथी दाश, गोकुल चंद्र दाश, उमाशंकर दाश और सत्य किंकर दाश यह दायित्व निभाते थे. वर्तमान में निरंजन दाश ''पिंकू'' परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि औषधि तैयार करने के लिए कई दिनों तक जंगलों में जाकर दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संग्रह करना पड़ता है.

दस जड़ी-बूटियों से तैयार होती है औषधि

दशमूल औषधि में कृष्ण परणी, शाल परणी, अगिबथु, फणफणा, पाटेली, गोखरा, बेल, गम्हारी, लबिंग कोली और अंकरांती जैसी औषधीय वनस्पतियों का निर्धारित अनुपात में उपयोग किया जाता है. आयुर्वेद में इन जड़ी-बूटियों का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि इनसे तैयार काढ़ा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, शरीर के तापमान को संतुलित रखने और बुखार जैसी समस्याओं से राहत देने में सहायक होता है. कृष्ण परणी सबसे दुर्लभ जड़ी-बूटी दशमूल औषधि का सबसे महत्वपूर्ण घटक कृष्ण परणी माना जाता है, जो जंगलों में अत्यंत दुर्लभ है. कई बार लंबे समय तक खोजबीन के बाद भी यह पौधा नहीं मिल पाता और सूखी जड़ी-बूटी से काम चलाना पड़ता है. निरंजन दाश ने बताया कि इस वर्ष ताजा कृष्ण परणी उपलब्ध हो गई है, जिसे औषधि में शामिल कर परंपरा के अनुसार भगवान को अर्पित किया जाएगा. धार्मिक आस्था और आयुर्वेदिक परंपरा का यह अनूठा संगम आज भी खरसावां की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है.


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By Sachindra Das

शचिंद्र कुमार दाश प्रभात खबर के वरीय संवाददाता हैं और हिंदी पत्रकारिता में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वे झारखंड और ओडिशा की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, कानून-व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके साथ ही कला, भाषा, संस्कृति, आध्यात्म और समसामयिक विषयों पर लेखन में उनकी विशेष रुचि है। नई जानकारियां जुटाना और उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के साथ पाठकों तक पहुंचाना उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, खेल, पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति से जुड़े विषयों को समेटती है। शचिंद्र कुमार दाश ग्राउंड रिपोर्टिंग पर विशेष जोर देते हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचकर तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करते हैं।

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