संथाल परगना का गठन संताली आदिवासियों के संघर्ष का परिणाम
साहिबगंज
झारखंड राजभाषा साहित्य अकादमी के तत्वावधान में संथाल परगना प्रमंडल की स्थापना की 170वीं वर्षगांठ पर प्रगति भवन के सभागार में संगोष्ठी हुई. अध्यक्षता विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के कुलाधिपति डॉ रामजन्म मिश्र ने की. मुख्य अतिथि प्रख्यात इतिहासकार संतोष कुमार तिवारी ने संगोष्ठी का शुभारंभ किया. इस अवसर पर संथाल विद्रोह के महान नायकों सिदो–कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया गया. “संथाल हूल और इसके परिणाम” विषय पर संगोष्ठी का विषय प्रवेश करते हुए झारखंड राजभाषा साहित्य अकादमी के सचिव डॉ सच्चिदानंद ने कहा कि संथाल परगना प्रमंडल की स्थापना का इतिहास ब्रिटिश साम्राज्य की औपनिवेशिक नीतियों और स्थानीय आदिवासी समुदायों के संघर्ष से गहराई से जुड़ा है. बताया कि 1855-56 के संथाल हूल के बाद अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा और नियंत्रण के उद्देश्य से संथाल परगना को अलग इकाई के रूप में गठित किया. साहित्यकार अनिरुद्ध प्रभास ने कहा कि संथाल परगना का गठन संथाल आदिवासियों के संघर्षों का प्रत्यक्ष परिणाम था. उन्होंने इसे संताली भाषा के लिए भी गौरव का दिन बताया, क्योंकि आज ही के दिन संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था. एनआरपी विद्यालय के प्राचार्य मनोज कुमार झा ने कहा कि संथाल हूल का मुख्य कारण ब्रिटिश प्रशासन और जमींदारी व्यवस्था द्वारा आदिवासियों की भूमि एवं आजीविका पर किया गया अत्याचार था. पर्यावरणविद् नवल कुमार झा ने कहा कि अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में भारी कराधान, भूमि अधिग्रहण और व्यापारिक शोषण की नीतियां लागू कीं, जिससे आदिवासी समाज अत्यधिक पीड़ित हुआ. मुख्य वक्ता डॉ रामजन्म मिश्र ने कहा कि संथाल हूल केवल विद्रोह नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई थी. इस विद्रोह में हजारों आदिवासी शहीद हुए, हालांकि इसके बाद ब्रिटिश सरकार को अपनी प्रशासनिक रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा. इतिहासकार संतोष कुमार तिवारी ने कहा कि संथाल हूल के 102 वर्षों बाद देश आजाद हुआ. 26 वर्षों बाद संथाल परगना का विभाजन कर छोटे जिलों का गठन किया गया, लेकिन इसके बावजूद विकास की किरण अब भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पायी है. उन्होंने इसके लिए सतत प्रयास की आवश्यकता पर बल दिया. कार्यक्रम में वक्ताओं ने संथाल परगना के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. अंत में हूल के अमर शहीदों को नमन करते हुए कार्यक्रम का समापन किया गया. इस दौरान मुख्य रूप से गौरव रामेश्वरम, गरिमा मिश्रा, नकुल मिश्रा , यशराज, श्रेया मिश्रा, मुन्ना पासवान मौजूद थे.
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