तेलियागढ़ी किला को संरक्षण के लिए एएसआइ को सौंपने की सिफारिश

डीसी हेमंत सती ने पर्यटन, कला, संस्कृति, खेलकूद एवं कार्य विभाग के सचिव को पत्र में लिख है

मंडरो साहिबगंज जिले के ऐतिहासिक तेलियागढ़ी किले को संरक्षित करने के लिए इसे आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) को सौंपने की अनुशंसा की गयी है. डीसी हेमंत सती ने पर्यटन, कला, संस्कृति, खेलकूद एवं कार्य विभाग के सचिव को पत्र में बताया कि तेलियागढ़ी किला साहिबगंज की एक ऐतिहासिक धरोहर है और इसे जिले के पर्यटन स्थलों की श्रेणी-सी में अधिसूचित किया गया है. उन्होंने पर्यटन सचिव से अनुरोध किया है कि तेलियागढ़ी किले के संरक्षण के लिए इसे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को सौंपने की आवश्यक कार्रवाई की जाए. तेलियागढ़ी किला 13वीं शताब्दी में बनाया गया था. यहां कभी हुमायु, शेरशाह, अकबर और शाह सुजा सहित कई बादशाहों की तलवारें चमकती थीं. वर्तमान में यह किला उपेक्षा का शिकार है, जिसे संरक्षण और देखभाल की अत्यंत आवश्यकता है. 2 जून 2025 और 30 अक्टूबर 2025 को जिला पर्यटन संवर्धन परिषद की बैठकों में पर्यटन स्थल तेलियागढ़ी किले के संरक्षण के लिए इसे एएसआई को सौंपे जाने का निर्णय लिया गया. किला खंडहर में तब्दील, बचे केवल अवशेष तेलियागढ़ी किला अब खंडहर में तब्दील हो चुका है, जिसमें केवल अवशेष ही बचे हैं. हालांकि, किले के अवशेष उसकी प्राचीनता और भव्यता को प्रदर्शित करते हैं. यह बहुमूल्य धरोहर संरक्षण की कमी के कारण अपना अस्तित्व धीरे-धीरे खो रहा है. किले की बनावट ऐसी थी कि जल मार्ग या भू-मार्ग से कोई भी आक्रमण संभव नहीं था. प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से यह एक अत्यंत मनोहारी स्थल पर स्थित है. इस किले के ऐतिहासिक महत्व का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 10वीं सदी में ईरानी यात्री अल्ट्रान लतीफ और 18वीं सदी में फ्रांसीसी यात्री बुकानन ने अपनी रचनाओं में इसे बड़े क्षेत्र में स्थित बताया है. बंगाल का प्रवेश द्वार कहा जाता था यह किला तेलियागढ़ी किला झारखंड के साहिबगंज जिले में स्थित एक ऐतिहासिक किला है, जो जिला मुख्यालय से 7-8 किलोमीटर दूर करमटोला पहाड़ के तलहटी में है. इस किले को कभी बंगाल का प्रवेश द्वार कहा जाता था क्योंकि यह रणनीतिक रूप से गंगा नदी के किनारे मुख्य व्यापारिक मार्ग पर स्थित था. मुगल काल में इसका बड़ा महत्व था. इस किले का इतिहास मौर्य काल से जुड़ा है. चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में यवन राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ””””इंडिका”””” में इस किले को बौद्ध बिहार के रूप में उल्लेखित किया है. वहीं, हर्षवर्धन के समय में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी तेलियागढ़ी किले का जिक्र किया है. कभी एक किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ था तेलियागढ़ी किला तेलियागढ़ी किले के आसपास के अवशेषों को देखकर लगता है कि यह किला लगभग एक किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ था. किले की तत्कालीन लंबाई और चौड़ाई का अनुमान पूर्व में करीब 500 मीटर दूरी पर स्थित मध्यकालीन दीवारों से लगाया जा सकता है. साहिबगंज के डीसी का प्रयास है कि तेलियागढ़ी किला एएसआई को सौंपे जाने से यह धरोहर सुरक्षित और संरक्षित हो जाएगी. भूवैज्ञानिक एवं पर्यावरणविद की राय तेलियागढ़ी किले को जिला प्रशासन और राज्य सरकार द्वारा संरक्षित करते हुए इसे पर्यटन स्थल का दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि यह भू-वैश्विक विरासत एवं ऐतिहासिक धरोहर के रूप में बचा रहे और कहीं विलुप्त ना हो जाए. यदि यह धरोहर नष्ट हो गई, तो हमें इसके पुनः दर्शन का अवसर नहीं मिलेगा. इसलिए इसे हर हाल में संरक्षित करने की आवश्यकता है. यह धरोहर इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और नई पीढ़ी के लिए एक अनमोल उपहार होगी. डॉ. रणजीत कुमार सिंह भूवैज्ञानिक एवं पर्यावरणविद, प्राचार्य राजमहल मॉडल कॉलेज, राजमहल, साहिबगंज

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By Abdhesh singh

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