प्रभात परिचर्चा . ‘खासमहल की समस्या व निदान’ पर वरीय सदस्यों ने कहा
खासमहल की समस्या पर बुद्धिजीवियों ने राय देते हुए इसे अंगरेजों द्वारा बनाया गया काला कानून बताया. कहा कि रैयती जमीन पर मालिकाना हक से लोग वंचित हैं. राजनीति से ऊपर उठ कर इसे समाप्त करने में सबको सहयोग देना चाहिए.
साहिबगंज : प्रभात खबर कार्यालय में रविवार को प्रभात परिचर्चा का आयोजन किया गया है. ‘खासमहल की समस्या व निदान’ पर चर्चा की गयी. इसकी अध्यक्षता खासमहल उन्मूलन समिति के वरीय सदस्य ललित स्वदेशी ने की. इस दौरान सदस्यों ने 10 से आंदोलन करने आह्वान किया. आजादी के 70 साल बाद भी भी साहिबगंज में गुलामी की त्रासदी बदस्तूर जारी है. साहिबगंज शहर की करीब एक लाख की आबादी 1930 से ही अपनी रैयती जमीन पर मलिकाना हक के लिये संघर्ष कर रही है.
अंगरेजों की दमनकारी नीति का अनुकरण करते हुये वर्तमान सरकार भी साहिबगंज के लोगों को लगातार यहां का जमीन से बेदखल करने की कोशिश कर रही है. सरकार यहां के रैयती जमीन को खासमहल कहती है, जबकि इस जमीन का पूर्व में रजिस्ट्री होता था. प्रमाण के रूप में कई रैयतों के पास रजिस्ट्री एवं केवाला है.
दीगर बात यह है कि झारखंड बनने के बाद भी यहां के रैयतों का लगान रसीद कटता रहा, जो वर्तमान में सरकार के मौखिक आदेश से बंद है. साहिबगंज की जमीन का विधानसभा की उपसमिति ने 2004 में प्रतिवेदन समर्पित किया था. कार्यान्वयन समिति ने भी 28 अगस्त 2006 के अपना प्रतिवेदन विधानसभा में उपस्थित कर दिया. समिति ने अपनी अनुशंसा में स्पष्ट किया था कि साहिबगंज खासमहल के भूमि नहीं है. इसके बावजूद राज्य सरकार यहां के लोगों के साथ न्याय नहीं कर पा रही है. 2001 से राजस्व लगान खरीद बंद है.
