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प्रवचन : गुरु-शिष्य संबंधों में शिष्य का मन हर क्षण गुरु में लगा रहता हैकाम करते हुए ध्यान का दूसरा रूप गुरु-शिष्य संबंधों में दृष्टिगोचर होता है. आध्यात्मिक मार्ग में चलने के लिए हमें तीन महत्वपूर्ण वस्तुओं की आवश्यकता होती है. पहला मंत्र जो वाहन का कार्य करता है, दूसरा गुरु जो मार्गदर्शक होता है […]

प्रवचन : गुरु-शिष्य संबंधों में शिष्य का मन हर क्षण गुरु में लगा रहता हैकाम करते हुए ध्यान का दूसरा रूप गुरु-शिष्य संबंधों में दृष्टिगोचर होता है. आध्यात्मिक मार्ग में चलने के लिए हमें तीन महत्वपूर्ण वस्तुओं की आवश्यकता होती है. पहला मंत्र जो वाहन का कार्य करता है, दूसरा गुरु जो मार्गदर्शक होता है तथा तीसरा इष्ट-देवता जो हमारा लक्ष्य है. अंतिम विश्लेषण के फलस्वरूप तीनों एक ही हैं. जब हमें ये तीनों बेशकीमती तोहफे उपलब्ध होते हैं, तब हम अपने जीवन का आध्यात्मिकरण कर सकते हैं. गुरु से मिलन शिष्य के आध्यात्मिक जीवन की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना होती है. गुरु मंत्र-दीक्षा प्रदान कर शिष्य को प्रेरणा देते हैं तथा उस मार्ग का संकेत देते हैं जिस पर शिष्य को चलना है. गुरु-शिष्य संबंधों में शिष्य का मन हर क्षण गुरु में लगा रहता है. इससे वह लक्ष्योन्मुख, श्रद्धालु तथा समर्पित रहता है. जब शिष्य में शक्ति होती है तो भौतिक दूरी उसे गुरु से सान्निध्य की अनुभूति से विलग नहीं कर सकती. उसे आज्ञा चक्र में गुरु से आदेश प्राप्त होते हैं तथा दैनिक जीवन में उनकी कृपा का प्रसाद मिलता रहता है.

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