प्रवचन : शरीर तथा मन निरंतर उलझे रहते हैं पर ध्यान कराता है यथार्थता का बोधध्यान की अवस्था में पहुंचने पर हम अनुभव करेंगे कि हम स्वयं कर्ता नहीं है. हमारे चारो ओर जो कुछ भी हो रहा है, वह कर्म के नियम, कार्यकरण के आधीन यंत्रवत हो रहा है. शरीर तथा मन जीवन के संघर्ष में निरंतर उलझे रहते हैं परंतु ध्यान का अनुभव हमें इस यथार्थता का बोध कराता है कि हम शरीर और मन से परे द्रष्टा मात्र हैं. यहां पर जीवन के सभी नियम, विधियां तथा व्यवस्थाएं रूपांतरित हो जाती हैं क्योंकि हमारी चेतना का प्रवाह भीतर की ओर होता है. अब हमारी निम्न प्रकृति आत्मा से दूर नहीं खिंच सकती. हम निस्वार्थ सेवा का जीवन जीते हैं. कोई हमसे ऐसा करने के लिए नहीं कहता और न हम दिखावे के लिए ऐसा कहते हैं. परंतु ध्यान की उपलब्धि द्वारा हमें ऐसा बोध होता है कि आनंद को सतत बनाये रखने के लिए निस्वार्थ सेवाय जीवन के अतिरिक्त और कोई अन्य रास्ता नहीं है जैसा कि अमेरिकी कवि वाल्ट व्हिट्मैन ने कहा है-मैं कर्तव्य से प्रेरित होकर किसी को कुछ नहीं देता. दूसरे लोग जो कुछ कर्तव्यवश देते हैं मैं उसे जीवित प्रेरणावश देता हूं. (क्या मैं हृदय के कार्यों को कर्तव्यवश दूंगा ?)
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