डॉ. रामदयाल मुंडा की जयंती पर बोले कुलपति- बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, भाषा-संस्कृति के संरक्षण में योगदान अविस्मरणीय

रांची में पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा की जयंती पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस अवसर पर वक्ताओं ने उनके बहुमुखी व्यक्तित्व और भाषा-संस्कृति के संरक्षण में उनके अमूल्य योगदान को याद किया. डॉ. मुंडा को एक महान भाषाविद्, संगीतकार और शिक्षाविद् के रूप में सराहा गया.

रांची: पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा की जयंती के अवसर पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू), रांची में कार्यक्रम आयोजित किया गया. विश्वविद्यालय के मुंडारी भाषा विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कुलपति प्रो. (डॉ.) राजीव मनोहर ने कहा कि डॉ. रामदयाल मुंडा बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व थे. वे भाषाविद्, संगीतकार, शिक्षाविद् और लोक कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान रखते थे.

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और डॉ. रामदयाल मुंडा के छायाचित्र पर पुष्पार्पण के साथ हुई. इसके बाद मुंडारी भाषा विभाग के विद्यार्थियों ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया. जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के समन्वयक डॉ. विनोद कुमार ने स्वागत भाषण देते हुए डॉ. मुंडा के जीवन और उपलब्धियों का संक्षिप्त परिचय दिया. उन्होंने कहा कि डॉ. मुंडा दिउड़ी से उठकर रांची और रांची से विदेश तक अपनी पहचान बनाने में सफल रहे. वर्ष 2010 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. उन्होंने कोलकाता की प्रसिद्ध पत्रिका में भी लेख प्रकाशित किए.

भाषा और संस्कृति के संरक्षण पर जोर

डॉ. रामदयाल मुंडा के सुपुत्र गुंजन एकिर मुंडा ने उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ. रामदयाल मुंडा ने इसी रांची कॉलेज से एंथ्रोपोलॉजी की पढ़ाई की और दक्षिण एशिया से संस्कृत का अध्ययन किया. उन्होंने कहा कि भारत में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की शुरुआत झारखंड से ही हुई है.

रांची विश्वविद्यालय से पहुंचे मुंडारी भाषा के डॉ. जुरान सिंह मनकी ने डॉ. रामदयाल मुंडा के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने पूरे झारखंड को प्रभावित किया. वे अपनी संस्कृति और भाषा को लेकर अमेरिका तक गए. उन्होंने डॉ. मुंडा से जुड़े कई प्रसंगों का उल्लेख भी किया.

हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जिंदर सिंह मुंडा ने डॉ. रामदयाल मुंडा को 21वीं सदी के महान व्यक्तित्वों की पंक्ति में रखते हुए कहा कि वे असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे. उन्होंने कहा कि डॉ. मुंडा ने जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए गीत, कहानी और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ-साथ आधुनिक माध्यमों का भी उपयोग किया जाना चाहिए.

साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में भी योगदान

साहित्यकार महादेव टोप्पो ने डॉ. रामदयाल मुंडा को मुंडारी भाषा का विद्वान बताते हुए कहा कि अनुवाद के क्षेत्र में भी उनकी गहरी रुचि थी. उनके पास विभिन्न प्रकार के ज्ञान की गहराई थी. उन्होंने कहा कि आदिवासी जीवनशैली और संस्कृति में डॉ. मुंडा की गहरी रुचि थी. उन्होंने लोगों से डॉ. रामदयाल मुंडा के लेखों को पढ़ने की अपील की.

कार्यक्रम का संचालन मुंडारी भाषा विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. शांति नाग ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन विभाग की शिक्षिका डॉ. दशमी ओडेया ने किया.

इस अवसर पर हिंदी के विद्वान कमल बोस, इंदिरा गांधी कला केंद्र, रांची के निदेशक कुमार संजय झा, हो विभाग के डॉ. जयकिशोर मंगल, संताली विभाग की डॉ. डुमनी माई मुर्मू, संतोष मुर्मू, नागपुरी की डॉ. मालती वागीशा लकड़ा, कुड़ुख की डॉ. सीता कुमारी, डॉ. सुनीता कुमारी, खड़िया की शांति केरकेट्टा समेत विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और शिक्षकेतर कर्मचारी उपस्थित थे.


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By शुभम राय

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