जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित माॅनसून और लगातार घटते भूजल स्तर के बीच खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती कम पानी में अधिक उत्पादन की है. ऐसे समय में उषा मार्टिन फाउंडेशन की ड्रिप सिंचाई पहल झारखंड के किसानों के लिए टिकाऊ और लाभकारी खेती का प्रभावी मॉडल बनकर उभरी है. फाउंडेशन चार वर्षों से रांची जिले के नामकुम और अनगड़ा प्रखंडों में सूक्ष्म सिंचाई तकनीक को बढ़ावा दे रहा है. इस दौरान 119 किसानों के खेतों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित की गयी है. इसके परिणामस्वरूप किसानों ने कम पानी में अधिक उत्पादन हासिल किया है. साथ ही सब्जियों, नकदी फसलों और मोटे अनाज की खेती का दायरा भी बढ़ा है.
फाउंडेशन के प्रमुख डॉ मयंक मुरारी ने बताया कि संस्था का उद्देश्य किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़कर उनकी आय बढ़ाना और जल संरक्षण को प्रोत्साहित करना है. उन्होंने कहा कि ड्रिप सिंचाई तकनीक से 40 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, जबकि फसल उत्पादन में 30 से 50 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गयी है. इस प्रणाली में पानी नियंत्रित मात्रा में सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे पानी की बर्बादी रुकती है और खरपतवार भी कम उगते हैं.
जानुम गांव के किसान शंकर महतो ने बताया कि पहले पानी की कमी से फसल प्रभावित होती थी, लेकिन ड्रिप सिंचाई लगने के बाद कम पानी में भी अच्छी सब्जी की खेती हो रही है और उत्पादन के साथ आय भी बढ़ी है. हेसल गांव के किसान बलकुवार महतो के अनुसार अब पानी की बर्बादी लगभग समाप्त हो गयी है. पौधों को समय पर पर्याप्त पानी मिलने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है. वहीं उलातू गांव के किसान महावीर महतो का कहना है कि ड्रिप सिंचाई ने खेती का तरीका ही बदल दिया है. पहले जितना पानी एक खेत में लगता था, अब उसी पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई हो रही है. हेसल गांव की किसान अंजनी देवी ने कहा कि ड्रिप सिंचाई से सब्जियों की खेती पहले की तुलना में अधिक आसान हो गयी है.
