रांची: रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग (टीआरएल) में पीएचडी करने वाले विद्यार्थियों को बड़ी राहत मिली है. अब विभाग के नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसर शोधार्थियों के को-गाइड बन सकेंगे. वहीं, शोधार्थियों के मुख्य गाइड टीआरएल के नियमित शिक्षक के अलावा ह्यूमिनिटिज के किसी भी भाषा विषय के नियमित शिक्षक भी बन सकेंगे.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने गाइड की कमी को देखते हुए यह निर्णय लिया है. हालांकि, को-गाइड बनने वाले नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसर टीआरएल विभाग के ही होने चाहिए. विश्वविद्यालय के इस फैसले से लंबे समय से गाइड की कमी के कारण पीएचडी नहीं कर पा रहे विद्यार्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है.
चार दर्जन से अधिक विद्यार्थी गाइड के इंतजार में
बताया जाता है कि टीआरएल विभाग में चार दर्जन से अधिक विद्यार्थी नेट/जेआरएफ उत्तीर्ण करने के बाद भी गाइड नहीं मिलने के कारण पीएचडी शुरू नहीं कर पा रहे हैं. शोधार्थियों को शोध कार्य से वंचित नहीं रहना पड़े, इसे देखते हुए विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सरोज शर्मा ने यह पहल की है.
टीआरएल के विद्यार्थियों और अबुआ अधिकार मंच की ओर से भी लंबे समय से ह्यूमिनिटिज के विभिन्न भाषा विषयों के नियमित शिक्षकों को टीआरएल के विद्यार्थियों का पीएचडी गाइड बनाने की मांग उठायी जा रही थी. विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि नये प्रावधान से शोधार्थियों को गाइड उपलब्ध कराने में काफी सहूलियत होगी.
विशेष परिस्थिति में बढ़ सकती हैं पीएचडी की सीटें
विश्वविद्यालय प्रशासन टीआरएल विषयों में विशेष परिस्थिति में पीएचडी की सीटें बढ़ाने पर भी शीघ्र विचार करेगा. इससे गाइड की कमी के साथ-साथ शोधार्थियों के लिए उपलब्ध सीटों की समस्या को भी दूर करने में मदद मिल सकती है.
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