रांची से राजकुमार लाल की रिपोर्ट
Madhushravani Festival 2026: मैथिली भाषी समाज का प्रमुख लोकपर्व मधुश्रावणी सोमवार से शुरू हो रहा है. इस पर्व को लेकर नवविवाहित महिलाओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है. विवाह के बाद पहली बार मधुश्रावणी मनाने वाली नवविवाहिताएं ससुराल से अपने मायके पहुंच चुकी हैं और पूजा-अर्चना की तैयारियों में जुटी हुई हैं. घरों में पारंपरिक गीत गूंजने लगे हैं और पूजा स्थलों को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है.
पहली मधुश्रावणी नवविवाहिताओं के लिए खास
कोलकाता स्थित आईबीएम कंपनी में कंसल्टेंट के पद पर कार्यरत अंशु झा ने बताया कि इस वर्ष उनकी पहली मधुश्रावणी पूजा है. इसे लेकर वह बेहद उत्साहित हैं. उन्होंने बताया कि पूरे परिवार के साथ पूजा की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. पूजा शुरू होने से पहले उन्होंने मेहंदी लगवाई है और घर में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार तैयारियां की जा रही हैं. परिवार की महिलाएं पारंपरिक गीत गा रही हैं, जिससे घर का माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो गया है.
मैथिली समाज का महत्वपूर्ण लोकपर्व
मधुश्रावणी बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र का एक प्रसिद्ध और पवित्र लोकपर्व है. जहां-जहां मैथिली भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं, वहां इस पर्व को पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यह पर्व विशेष रूप से नवविवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता है कि इस दौरान विधि-विधान से पूजा करने पर पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार में समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
13 दिनों तक चलता है यह पर्व
मधुश्रावणी पर्व कुल 13 दिनों तक मनाया जाता है. इसकी शुरुआत सावन मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि, जिसे मौना पंचमी भी कहा जाता है, से होती है. इसके बाद यह पर्व शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तक चलता है. इस वर्ष 15 अगस्त को तृतीया तिथि होने के कारण उसी दिन इस पर्व का समापन होगा.
गौरी-शंकर और नाग देवता की होती है पूजा
इस पर्व के दौरान पूजा कक्ष को विशेष रूप से सजाया जाता है. वहां गौरी-शंकर, भगवान गणेश तथा नाग देवता (विषहरा) की मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है. प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक विधि-विधान के साथ आराधना की जाती है.
फूल चुनने और सात्विक भोजन की परंपरा
मधुश्रावणी पर्व के दौरान नवविवाहित महिलाएं प्रतिदिन शाम को अपनी सखियों के साथ पूजा के लिए फूल चुनने जाती हैं. अगले दिन इन्हीं फूलों से देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. इस पूरे पर्व के दौरान महिलाएं बिना नमक का अरवा भोजन ग्रहण करती हैं और सात्विक जीवनशैली का पालन करती हैं.
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15 अगस्त को होगा समापन
पर्व के अंतिम दिन पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार टेमी दागने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. इसके साथ ही 13 दिनों तक चलने वाला मधुश्रावणी महापर्व संपन्न होगा. यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध लोक संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक एकता का भी जीवंत उदाहरण माना जाता है.
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