दिशोम गुरु से पहले झारखंड के नेता कड़िया मुंडा को भी मिल चुका है पद्म भूषण, आठ बार रहे खूंटी के सांसद

Padma Bhushan: झारखंड के वरिष्ठ आदिवासी नेता कड़िया मुंडा को 2019 में पद्म भूषण मिला था. अब दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत यह सम्मान दिया जा रहा है. रिपोर्ट में कड़िया मुंडा के राजनीतिक सफर, सीएनटी-एसपीटी विवाद और पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े अहम घटनाक्रम को विस्तार से बताया गया है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.

Padma Bhushan: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और दिशोम गुरु दिवंगत शिबू सोरेन को सोमवार यानी 25 मई 2026 की शाम को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों पद्म भूषण सम्मान (मरणोपरांत) प्रदान किया जाएगा. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 25 जनवरी 2026 को शिबू सोरेन का पद्म भूषण सम्मान देने का ऐलान किया गया था. यह पहली बार नहीं है कि झारखंड के किसी राजनेता को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान पद्म भूषण से नवाजा जा रहा है. इससे पहले खूंटी से करीब आठ बार सांसद रह चुके कड़िया मुंडा को भी साल 2019 में पद्म भूषण से नवाजा जा चुका है.

आठ बार सांसद रहे कड़िया मुंडा

20 अप्रैल 1936 को जन्मे कड़िया मुंडा झारखंड की आदिवासी राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं. उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर यानी एमए की पढ़ाई की थी. खूंटी लोकसभा सीट से उन्होंने छहवीं, नौवीं, 10वीं, 11वीं, 12वीं, 13वीं और 15वीं लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की. वे करीब आठ बार सांसद रहे और लंबे समय तक भाजपा के सबसे प्रभावशाली आदिवासी नेताओं में गिने जाते रहे.

पहली बार 1977 में केंद्रीय मंत्री बने कड़िया मुंडा

साल 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया. बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी वे केंद्रीय कैबिनेट का हिस्सा रहे. वर्ष 2009 से 2014 तक वे लोकसभा के उपाध्यक्ष पद पर भी रहे. कोल्हान और खासकर खूंटी इलाके में उनकी सादगी, साफ छवि और आदिवासी समाज में मजबूत पकड़ की चर्चा लंबे समय तक होती रही.

पद्म भूषण से सम्मानित होने की वजह

कड़िया मुंडा को आदिवासी समाज, सामाजिक कार्यों और संसदीय राजनीति में लंबे योगदान के लिए साल 2019 में पद्म भूषण सम्मान दिया गया था. उन्हें भाजपा में आदिवासी नेतृत्व के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है. फिलहाल वे सक्रिय राजनीति से दूर अपने पैतृक गांव में समय बिता रहे हैं.

सीएनटी-एसपीटी संशोधन बना बड़ा विवाद

हालांकि कड़िया मुंडा का राजनीतिक जीवन विवादों से पूरी तरह अछूता नहीं रहा. वर्ष 2016-17 में रघुवर दास सरकार ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 में संशोधन का प्रस्ताव लाया था. इन दोनों कानूनों को आदिवासी जमीन की सुरक्षा का सबसे बड़ा कानूनी कवच माना जाता है. प्रस्तावित संशोधन के तहत आदिवासी जमीन को व्यावसायिक उपयोग और पट्टे पर देने की अनुमति देने का प्रावधान किया गया था. विपक्षी दलों और आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया कि इससे कॉरपोरेट कंपनियों के लिए आदिवासी जमीन हासिल करना आसान हो जाएगा. उस समय विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन ने भी सरकार पर आदिवासी हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया था.

पत्थलगड़ी आंदोलन में बंधक बनाए गए थे कड़िया मुंडा

इन्हीं संशोधनों के विरोध में झारखंड में पत्थलगड़ी आंदोलन तेज हो गया था. कई इलाकों में आदिवासी समुदाय ने उग्र प्रदर्शन किए. एक घटना में प्रदर्शनकारियों ने भाजपा सांसद कड़िया मुंडा की सुरक्षा टीम को बंधक बना लिया था. इसके बाद पुलिस कार्रवाई हुई जिसमें एक आदिवासी युवक की मौत हो गई. इस आंदोलन के दौरान आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी समेत 200 से अधिक लोगों पर केस दर्ज किए गए थे. उस समय झारखंड की राज्यपाल रहीं द्रौपदी मुर्मू से आदिवासी संगठनों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन उन्होंने आंदोलनकारियों से संविधान में विश्वास रखने की अपील की थी.

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द्रौपदी मुर्मू ने लौटाया था विधेयक

सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक को लेकर झारखंड की तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को कुल 192 ज्ञापन मिले थे. भारी विरोध और राजनीतिक दबाव के बाद 24 मई 2017 को उन्होंने इन विधेयकों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया और सरकार को वापस भेज दिया. बाद में अगस्त 2017 में राज्य सरकार ने यह विधेयक वापस ले लिया. इसी घटनाक्रम ने झारखंड की राजनीति में आदिवासी जमीन, पहचान और अधिकारों के सवाल को फिर से केंद्र में ला दिया था. आज जब शिबू सोरेन को पद्म भूषण से सम्मानित किया जा रहा है, तब कड़िया मुंडा और शिबू सोरेन दोनों की राजनीतिक विरासत को झारखंड की आदिवासी राजनीति के दो अलग-अलग लेकिन प्रभावशाली अध्यायों के रूप में देखा जा रहा है.

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लेखक के बारे में

Published by: KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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