रांची. करम पर्व केवल करम की डाली की पूजा का नाम नहीं है. यह उस जीवन-दर्शन का उत्सव है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व के आधार हैं. झारखंडी समाज ने सदियों पहले जिस सत्य को अपने लोकपर्वों में स्वीकार किया था, आज वही सत्य पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण के बीच नये सिरे से समझने को विवश है.
भादो की हरियाली, खेतों में लहलहाती धान की फसल और वर्षा से निखरी धरती के बीच करम पर्व का आगमन होता है. अखरा में करम की डाली स्थापित होती है, गीत गूंजते हैं और मांदर की थाप पर गांव झूम उठता है. यह उल्लास केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कृषि, प्रकृति, श्रम और सामुदायिक जीवन के बीच गहरे रिश्ते की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है.
करम के गीतों में प्रेम, श्रम और खेती
करम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह 'मैं' को 'हम' में बदल देता है. आदिवासी और सदान समुदायों की साझी भागीदारी, सामूहिक पूजा, गीत और नृत्य इस पर्व को झारखंडी सामाजिक जीवन की साझा विरासत बनाते हैं. करम के गीतों में प्रेम, श्रम, खेती, परिवार और बेहतर जीवन की कामना दिखाई देती है. यहां प्रकृति पूज्य भी है और जीवन की सहभागी भी.
लेकिन आज करम के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा है कि जिस प्रकृति की हम पूजा कर रहे हैं, क्या उसे बचा भी रहे हैं? जंगलों का घटता आकार, जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव, बदलता मौसम, अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और तेजी से बदलती ग्रामीण जीवनशैली करम की मूल चेतना को चुनौती दे रहे हैं.
करम की डाली को अखरा में स्थापित करके प्रकृति की पूजा करना तभी सार्थक है, जब गांव के जंगल, खेत, नदी, पहाड़ और जलस्रोत भी सुरक्षित रहें.
करम का संदेश : प्रकृति को बचाइये
आज करम को केवल परंपरा बचाने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य बचाने के लिए समझने की जरूरत है. आधुनिक विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति को समाप्त करके आगे बढ़े, अंततः मनुष्य के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकता है.
करम हमें कोई जटिल दर्शन नहीं सिखाता. उसका संदेश बेहद सरल है - प्रकृति को बचाइये, श्रम का सम्मान कीजिए, समाज को जोड़िये और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन की जमीन सुरक्षित रखिये.
प्रकृति से जितना लें, उससे अधिक लौटायें
इसलिए इस बार करम की डाली के सामने केवल समृद्धि की प्रार्थना न हो, बल्कि एक संकल्प भी हो कि जितना प्रकृति से लेंगे, उससे अधिक उसे लौटायेंगे.
क्योंकि जिस दिन जंगल नहीं होंगे, नदियां नहीं होंगी और अखरा सूने हो जायेंगे, उस दिन करम का उत्सव तो शायद बचेगा, लेकिन करम की आत्मा नहीं बचेगी.
