रांची. झारखंड के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के अचानक निधन से राज्य की राजनीति को बड़ा झटका लगा है. लेकिन उनके निधन के साथ ही उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े एक ऐसे दौर का भी एक अहम चेहरा सामने से हट गया, जिसमें सरकार और आंदोलनरत छात्रों के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश चल रही थी. खासकर JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर अगस्त में चले छात्र आंदोलन के दौरान सुदिव्य सोनू सरकार और अभ्यर्थियों के बीच बातचीत का प्रमुख चेहरा बने थे.
छात्रों से सीधे संवाद की पहल
JPSC-JSSC परीक्षा विवाद के बीच रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्र आंदोलन कर रहे थे. करीब 25 दिनों के बाद सरकार की ओर से छात्रों के प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत शुरू हुई, 7 अगस्त को सरकार और आंदोलनकारी अभ्यर्थियों के बीच पहली औपचारिक बातचीत हुई, जिसमें सुदिव्य सोनू भी शामिल थे. बैठक के बाद उन्होंने कहा था कि सरकार छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करेगी.
इसके बाद भी बातचीत का सिलसिला जारी रहा. 8 अगस्त को छात्रों के एक अन्य प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद उच्च शिक्षा मंत्री ने कहा था कि सरकार अलग-अलग छात्र संगठनों और संबंधित पक्षों से बातचीत करती रहेगी. उन्होंने छात्रों से सुझाव और शिकायतें लेने के लिए ईमेल के माध्यम से भी फीडबैक मांगा था. उनका तर्क था कि अलग-अलग पक्षों से मिलने वाले सुझावों के आधार पर परीक्षा व्यवस्था में सुधार की नीति तैयार की जा सकती है.
परीक्षा रद्द करने से लेकर सुधार तक बनी थी चर्चा
छात्र आंदोलन की मुख्य मांगों में 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा को रद्द कर दोबारा परीक्षा कराने और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग शामिल थी. सरकार के साथ बातचीत के दौरान परीक्षा व्यवस्था में सुधार का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया. बाद में सरकार ने 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा और बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति जतायी तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने की बात कही.
हालांकि JSSC CGL परीक्षा को रद्द करने और CBI जांच जैसी कुछ मांगों पर सरकार और छात्रों के बीच सहमति नहीं बन सकी. इसके बाद भी सरकार की ओर से परीक्षा प्रणाली को ज्यादा पारदर्शी बनाने और सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही जाती रही.
छात्रों और सरकार के बीच संवाद की कड़ी बने थे सुदिव्य सोनू
सुदिव्य सोनू उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री के तौर पर वे सीधे उस मुद्दे से जुड़े थे, जिसने हजारों प्रतियोगी परीक्षार्थियों को सड़क पर ला दिया था. सरकार के सामने चुनौती सिर्फ परीक्षाओं से जुड़ी शिकायतों को दूर करने की नहीं, बल्कि भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं के बीच पैदा हुए अविश्वास को कम करने की भी थी.
इसी दौरान सोनू ने छात्रों से सीधे बातचीत का रास्ता अपनाया. उन्होंने अलग-अलग छात्र समूहों से मिलने और उनकी राय लेने की बात कही. इससे सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद की एक औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई. हालांकि बाद के दौर में बातचीत बेनतीजा भी रही और आंदोलन जारी रहा.
अब आगे की प्रक्रिया पर नजर
सुदिव्य सोनू के निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि उच्च शिक्षा और परीक्षा सुधार से जुड़े उन मुद्दों पर आगे सरकार का चेहरा कौन होगा और पहले से शुरू प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ेगी. JPSC-JSSC को लेकर छात्रों की नाराजगी, परीक्षा व्यवस्था में सुधार और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे मुद्दे अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं.
सरकार ने भर्ती परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए उच्चस्तरीय समिति बनाने की दिशा में भी कदम उठाया है. ऐसे में सुदिव्य सोनू के निधन के बाद इस प्रक्रिया की निरंतरता और सरकार की ओर से छात्रों के साथ संवाद आगे किस रूप में जारी रहता है, इस पर अभ्यर्थियों और राजनीतिक दलों की नजर रहेगी.
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