रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Jharkhand High Court, रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने आईआईटी (आईआईएसएम) धनबाद में पिछले दो दशकों से दैनिक वेतनभोगी और आउटसोर्सिंग के भरोसे काम कर रहे सात कर्मचारियों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने संस्थान को सख्त निर्देश दिया है कि वे सभी प्रार्थियों की सेवाओं को तुरंत नियमित (Permanent) करें. अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि अगर पदों की कमी है, तो संस्थान नए पद बनाकर इन कर्मचारियों को परमानेंट करें. इसके अलावा, कर्मचारियों की पिछली सेवा अवधि को उनकी पेंशन, अवकाश (लीव) और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों (रिटायरमेंट बेनिफिट्स) के लिए निरंतर सेवा के रूप में जोड़ा जाएगा.
शैक्षणिक योग्यता का बहाना अब नहीं चलेगा
अदालत ने संस्थान की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया जो कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठा रही थीं. जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने स्पष्ट किया कि विशेष रूप से चतुर्थ श्रेणी (क्लास-4) के पदों पर 20 वर्षों तक लगातार सेवा देने के बाद, अब इस मोड़ पर आकर शैक्षणिक योग्यता के तकनीकी मुद्दे के आधार पर उनकी नियुक्ति को अमान्य या अवैध नहीं ठहराया जा सकता. अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी संस्थान आउटसोर्सिंग की आड़ लेकर कर्मचारियों के नियमितीकरण (Regularization) के अधिकार को अनिश्चित काल तक दबाकर नहीं रख सकते.
ये भी पढ़ें: मटकुरिया गोलीकांड: पूर्व मंत्री मन्नान मल्लिक समेत 30 दोषियों को 3 साल की सजा, 15 साल बाद आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले को कानूनी रूप से मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट के हाल के तीन बड़े फैसलों- जग्गो बनाम भारत संघ (2024), धरम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) और भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य (2026) का उदाहरण दिया. कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी 20 साल से ज्यादा समय से निरंतर काम कर रहा है, तो यह माना जाएगा कि उसे सौंपा गया कार्य स्थायी प्रकृति का है. ऐसे में स्वीकृत पद की अनुपलब्धता (कमी) परमानेंट करने के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती. कंपनियों या संस्थाओं द्वारा कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से रखना नियमितीकरण से बचने का महज एक बहाना है. आउटसोर्सिंग का उपयोग कर्मचारियों को कम वेतन पर रखने और उनके हक को मारने के लिए एक 'ढाल' के रूप में नहीं किया जा सकता. प्रार्थियों की ओर से अदालत में अधिवक्ता सौरव शेखर और अधिवक्ता अनुराग कुमार ने मजबूती से पैरवी की.
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी लड़ाई साल 2020 में शुरू हुई थी, जब आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के सात कर्मचारियों- सनोज कुमार शर्मा, शक्तिनाथ महतो, मो. ऐनुल अली, प्रणब हालदार, अभिषेक कुमार, अमर राम और राधिका हांसदा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. ये सभी प्रार्थी साल 2001 से 2017 के बीच अलग-अलग तारीखों से संस्थान में दैनिक वेतन (डेली वेज) पर काम कर रहे थे. साल 2017 में संस्थान ने एक चालाकी की और इन्हें सीधे रखने के बजाय आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से काम पर रख लिया, जिसके खिलाफ कर्मचारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
ये भी पढ़ें: वित्त मंत्री इस्तीफा दें, आदिवासियों की जमीन छीनना बंद करे सरकार, बाबूलाल मरांडी का हेमंत सरकार पर हमला
