रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने रांची के एक होटल में बकाया भुगतान से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए महिला के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है. जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने कहा कि केवल होटल का किराया या बकाया राशि का भुगतान नहीं करना अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता. अदालत ने पाया कि प्रथम दृष्टया मामला सिविल विवाद का है और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा. प्रार्थी नेहा शांडिल्या की ओर से झारखंड के पूर्व महाधिवक्ता सह वरीय अधिवक्ता राजीव रंजन ने बहस की.
क्या था पूरा मामला
मामला रांची के चुटिया थाना क्षेत्र स्थित एक होटल से जुड़ा है. शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2017 में महिला की मां ने खुद को फिल्म निर्माता और "रोज क्वार्ट्ज एंटरटेनमेंट" की संचालक बताते हुए अपनी फिल्म यूनिट के लिए 30 अक्टूबर से 24 नवंबर 2017 तक होटल के कई कमरे बुक कराए थे. कमरे का कुल किराया 2,65,535 रुपये हुआ. आरोप था कि बाद में उनकी बेटी डॉ नेहा शांडिल्या भी होटल में ठहरीं और होटल प्रबंधन को भुगतान का आश्वासन दिया, लेकिन राशि का भुगतान नहीं किया गया. इसके बाद वर्ष 2019 में शिकायत दर्ज कराई गई, जिस पर चुटिया थाना में धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज हुई.
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दी यह दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि यह मामला पूरी तरह भुगतान विवाद का है, जिसे आपराधिक रंग दिया गया है. पक्ष ने दलील दी कि उनके खिलाफ किसी भी प्रकार के फर्जी दस्तावेज तैयार करने या इस्तेमाल करने का आरोप नहीं है. इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 468, 470 और 471 के तहत जालसाजी और फर्जी दस्तावेज से जुड़े अपराध भी नहीं बनते. साथ ही सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल किराया या बकाया राशि का भुगतान नहीं करने से आपराधिक मामला नहीं बनता.
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का किया उल्लेख
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि धोखाधड़ी का अपराध तभी बनता है, जब शुरुआत से ही किसी व्यक्ति की धोखा देने की मंशा साबित हो. यदि बाद में भुगतान नहीं हो पाया या विवाद उत्पन्न हुआ, तो उसे स्वतः आपराधिक धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ जालसाजी की धाराएं तभी लागू हो सकती हैं, जब उसके द्वारा फर्जी दस्तावेज तैयार करने या उसका इस्तेमाल करने के स्पष्ट आरोप और साक्ष्य मौजूद हों.
कोर्ट ने कहा, नहीं बनता कोई आपराधिक मामला
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि शिकायत में यह आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता ने शुरुआत से ही होटल प्रबंधन को धोखा देने की योजना बनाई थी. शिकायत के अनुसार पहले उनकी मां ने होटल बुक कराया था और बाद में याचिकाकर्ता वहां पहुंचीं. इसके अलावा उनके खिलाफ किसी फर्जी दस्तावेज के निर्माण या उपयोग का भी आरोप नहीं है. ऐसे में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 470 और 471 के आवश्यक तत्व इस मामले में नहीं बनते.
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आपराधिक कार्यवाही रद्द, याचिका स्वीकार
इन तथ्यों के आधार पर झारखंड हाईकोर्ट ने माना कि महिला के खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा. अदालत ने रांची के चुटिया थाना कांड संख्या 203/2019 तथा शिकायत वाद संख्या 2458/2019 से संबंधित पूरी आपराधिक कार्यवाही को याचिकाकर्ता के विरुद्ध रद्द कर दिया. इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के भुगतान संबंधी विवादों को बिना पर्याप्त आपराधिक तत्व के आपराधिक मुकदमे का रूप नहीं दिया जा सकता. याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने महिला को राहत प्रदान की.
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