रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में कथित वन भूमि घोटाले और सीबीआई व प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है और उसने बिना पर्याप्त साक्ष्यों के गंभीर आरोप लगाए हैं. मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने डब्ल्यूपी (पीआईएल) नंबर 2139/2020 का निस्तारण करते हुए कहा कि केवल आरोपों के आधार पर सीबीआई या ईडी जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता.
450 एकड़ वन भूमि की अवैध बिक्री का लगा था आरोप
याचिका में दावा किया गया था कि हजारीबाग, बोकारो और अन्य जिलों में लगभग 450 एकड़ से अधिक वन भूमि की अवैध बिक्री हुई है. आरोप लगाया गया था कि वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत से निजी व्यक्तियों और कंपनियों को वन भूमि हस्तांतरित की गई. साथ ही सीबीआई और ईडी से जांच कराने तथा संबंधित अधिकारियों की संपत्तियों की जांच की मांग भी की गई थी.
कोर्ट ने कहा, आरोपों के समर्थन में नहीं है ठोस सामग्री
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने कई वरिष्ठ अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत के आरोप लगाए, लेकिन उनके समर्थन में कोई विश्वसनीय दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया. जिन अधिकारियों और संस्थाओं पर आरोप लगाए गए, उन्हें पक्षकार भी नहीं बनाया गया. अदालत ने इसे जनहित याचिका की मूल भावना के विपरीत माना.
सुप्रीम कोर्ट पहले भी लगा चुका है फटकार
खंडपीठ ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता शिव शंकर शर्मा के खिलाफ पहले भी सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट गंभीर टिप्पणियां कर चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2022 में एक मामले में कहा था कि याचिकाकर्ता बिना पर्याप्त आधार के उच्च पदस्थ व्यक्तियों पर आरोप लगाकर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हैं. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ पहले दायर कुछ जनहित याचिकाएं लागत (कॉस्ट) के साथ खारिज की जा चुकी हैं.
फिर भी पर्यावरण से जुड़े मुद्दे पर कोर्ट ने की विस्तृत सुनवाई
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की साख पर गंभीर सवाल होने के बावजूद पर्यावरण और वन संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय को देखते हुए मामले की मेरिट पर भी विचार किया गया. इसी उद्देश्य से पूर्व में विभिन्न आदेश पारित कर राज्य सरकार से जांच रिपोर्ट और शपथपत्र मंगाए गए थे.
जांच में क्या सामने आया
राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत 2,003 बिक्री विलेखों की जांच की गई. इनमें केवल 74 बिक्री विलेख ही अधिसूचित वन क्षेत्र से आंशिक या पूर्ण रूप से जुड़े पाए गए. इनका कुल क्षेत्रफल 112.3098 एकड़ था, जिसमें से लगभग 91.53 एकड़ वन सीमा के भीतर पाया गया. इनमें भी 80.03 एकड़ भूमि वन विभाग के शांतिपूर्ण कब्जे में है, जबकि करीब 11.49 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण मिला. इन मामलों में वन अपराध दर्ज कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की जा चुकी है.
अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप नहीं हुए साबित
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं हुआ कि वन विभाग ने किसी भी बिक्री विलेख के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) जारी किया था. इसलिए वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित नहीं हुए. अदालत ने यह भी पाया कि वन विभाग पहले से ही कई मामलों में बिक्री विलेख रद्द कराने और अतिक्रमण हटाने की कानूनी कार्रवाई कर रहा है.
इलेक्ट्रोस्टील मामले में भी जांच जारी
याचिका में इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड पर भी वन भूमि के अवैध उपयोग का आरोप लगाया गया था. अदालत ने कहा कि इस मामले में भी संबंधित एजेंसियां वर्ष 2009 से कार्रवाई कर रही हैं. झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय सशक्त समिति और अन्य प्राधिकरण इस विषय पर पहले से कार्रवाई कर चुके हैं. ऐसे में केवल याचिका के आधार पर नई जांच एजेंसी नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है.
सीबीआई और ईडी जांच की मांग ठुकराई
हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीआई या ईडी जांच का आदेश केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है. इस मामले में न तो जांच एजेंसियों की निष्क्रियता साबित हुई और न ही ऐसा कोई ठोस आधार मिला जिससे यह लगे कि निष्पक्ष जांच संभव नहीं है. इसलिए अदालत ने सीबीआई और ईडी जांच की मांग अस्वीकार कर दी.
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बिना लागत के निस्तारित हुई याचिका
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस आदेश को किसी भी कथित अतिक्रमणकर्ता या संबंधित पक्ष को क्लीन चिट नहीं माना जाएगा. जिन मामलों में कार्रवाई लंबित है, उनका फैसला कानून के अनुसार होगा. हालांकि अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता ने तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और मामले को सनसनीखेज बनाने का प्रयास किया. अंततः जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया गया और इस बार याचिकाकर्ता पर कोई अतिरिक्त लागत नहीं लगाई गई.
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