गिरिडीह डाकघर घोटाले पर हाईकोर्ट का फैसला: केंद्र की याचिका खारिज, कर्मचारी को राहत

झारखंड हाईकोर्ट ने गिरिडीह डाकघर के करोड़ों रुपये के घोटाले से जुड़े मामले में केंद्र सरकार को झटका दिया है. अदालत ने कर्मचारी के निलंबन से जुड़े मामले में केंद्र की रिट याचिका खारिज कर दी है, जो कर्मचारी के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण जीत है.


Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने गिरिडीह डाकघर के बहुचर्चित करोड़ों रुपये के घोटाले से जुड़े मामले में केंद्र सरकार को बड़ा झटका देते हुए उसकी रिट याचिका खारिज कर दी. अदालत ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कर्मचारी का निलंबन शुरुआती तीन महीने के बाद अवैध माना गया था और उसे तीन महीने के बाद के निलंबन काल का वेतन, पहले से मिले निर्वाह भत्ते को समायोजित कर, देने का निर्देश दिया गया था.

क्या है पूरा मामला

मामला गिरिडीह डिवीजन में सामने आए 26 करोड़ रुपये से अधिक के कथित डाकघर घोटाले से जुड़ा है. कर्मचारी शशि भूषण कुमार को 27 सितंबर 2019 को निलंबित किया गया था. विभाग का आरोप था कि वह गिरिडीह प्रधान डाकघर में ट्रेजरर और बाद में एपीएम (एसबी) के रूप में कार्यरत रहते हुए वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में प्रमुख आरोपी हैं. मामले की जांच सीबीआई कर रही थी और बाद में दो मामलों में चार्जशीट भी दाखिल की गई.

CAT ने दी थी राहत

कर्मचारी ने पहले विभागीय अपील की और बाद में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का दरवाजा खटखटाया. CAT ने जुलाई 2025 में फैसला सुनाते हुए कहा कि निलंबन के तीन महीने के भीतर विभागीय चार्जशीट नहीं दी गई, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से ऐसा करने की बात कहते हैं. इसी आधार पर अधिकरण ने तीन महीने के बाद बढ़ाए गए निलंबन को निरस्त कर दिया था.

हाईकोर्ट ने क्या कहा

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि कर्मचारी को 27 सितंबर 2019 को निलंबित किया गया, लेकिन विभागीय आरोपपत्र 7 मार्च 2022 को, यानी लगभग ढाई साल बाद दिया गया. अदालत ने माना कि बिना चार्जशीट के इतने लंबे समय तक निलंबन जारी रखना कानून के अनुरूप नहीं है.

सात साल तक लंबी चली विभागीय कार्रवाई पर सवाल

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि विभागीय कार्रवाई का समापन 2026 में हुआ, यानी पूरी प्रक्रिया लगभग सात वर्षों तक चली. कोर्ट ने पूछा कि आखिर इतनी लंबी देरी के लिए जिम्मेदार कौन है और यह भी कहा कि अनावश्यक रूप से लंबित विभागीय कार्रवाई कर्मचारी के अधिकारों पर प्रतिकूल असर डालती है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अजय कुमार चौधरी बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख किया. कोर्ट ने दोहराया कि यदि निलंबन के 90 दिनों के भीतर आरोपपत्र नहीं दिया जाता, तो निलंबन को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता. साथ ही, केवल लंबित आपराधिक जांच को अनिश्चितकालीन निलंबन का आधार नहीं बनाया जा सकता.

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केंद्र की दलील नहीं मानी

केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि मामला गंभीर वित्तीय घोटाले और सीबीआई जांच से जुड़ा है, इसलिए निलंबन उचित था. हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि CAT के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या विकृति नहीं है. इसी आधार पर रिट याचिका खारिज कर दी गई और स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि कर्मचारी दंडादेश को चुनौती देता है, तो उस पर अलग से सुनवाई होगी.

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By Rana pratap

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