गुमला. पहाड़ व जंगलों में निवास करने वाले विलुप्तप्राय आदिम जनजाति होली पर्व को अलग अंदाज में मनाते हैं. ठीक होली के एक दिन पहले आदिम जनजातियों में शिकार (जंगल में घूम कर बंदर, खरगोश, सूकर, सियार व भेड़िया का शिकार) करने की परंपरा है. यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. आदिम जनजाति के लोग दिनभर जंगल में शिकार करते हैं और शाम को थकावट दूर करने के लिए नाच गान के साथ खाना पीना करते हैं. बिरहोर व कोरवा दोनों जातियां विलुप्तप्राय हैं. लेकिन, गुमला जिले में इनकी संख्या है, जो आज भी जंगल व पहाड़ों के बीच रहते हैं. होली के एक दिन पहले ये लोग तीर-धनुष लेकर घने जंगल में शिकार करते हैं. इसके बाद देर शाम को गांव लौटकर सभी लोग शिकार किये गये जानवर को बनाकर खाते हैं. होली के दिन दोबारा ये लोग एक स्थान पर जुटकर सामूहिक रूप से खाते-पीते व नाचते गाते हैं. विमलचंद्र असुर ने बताया कि असुर जनजाति भी जंगल व पहाड़ी क्षेत्र के गांवों में निवास करते हैं. इस जनजाति में महिला व पुरुष दोनों शिकार करते हैं. पुरुष वर्ग जंगल में जाकर जंगली सूकर, सियार या भेड़िया का शिकार करते हैं. इसके लिए 15 दिन पहले से तीर धनुष बनाना शुरू हो जाता है. वहीं, महिलाएं तालाब, नदी व डैम में मछली मारती हैं. ये लोग शाम को घर आते हैं और खाना पीना करते हैं. थकावट दूर करने के लिए ये लोग भी नाच गान करते हैं.
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