रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
High Court Hearing: बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम (बीएसआईडीसीएल) के झारखंड स्थित बंद कारखानों के कर्मचारियों और उनके आश्रितों के सालों से लंबित बकाए भुगतान तथा उन्हें लंबे समय से रह रहे आवासों को लीज पर देने के संवेदनशील मुद्दे पर आगामी 30 जुलाई को झारखंड हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होगी. जीवनयापन के लिए अपने ही बकाए पैसे के लिए तरस रहे कर्मियों के हक में हाईकोर्ट में जनहित याचिका (सं-6507/2010) दायर की गई थी.
हाईकोर्ट में दो मामलों में सुनवाई
इसके अलावा, कारखानों के आवासीय परिसरों में दशकों से रह रहे लोगों ने बकाए भुगतान के साथ-साथ आवासों को दीर्घकालीन लीज या बिक्री के आधार पर आवंटित करने की मांग को लेकर भी एक याचिका (wp(s)-2647/2008) दायर की थी. हाईकोर्ट द्वारा इन दोनों ही मामलों की सुनवाई एक साथ की जा रही है. आगामी 30 जुलाई को झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ दोपहर 2.15 बजे से इस मामले पर सुनवाई करेगी.
कोर्ट ने मांगा था स्टेटस रिपोर्ट
इससे पूर्व 14 मई को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बीएसआईडीसी सहित मामले से जुड़े सभी पक्षों के अधिवक्ताओं को 30 जून तक शपथपत्र के जरिए स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था. इसके साथ ही अदालत ने 24 जुलाई तक सभी पक्षों से उनकी मुख्य दलीलों का लिखित सारांश (सिनोपसिस ऑफ द आर्गुमेंट्स) जमा करने का भी आदेश दिया था. अब इस मामले में 30 जुलाई को होने वाली सुनवाई को बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे तीन दशकों से संकट झेल रहे सैकड़ों परिवारों के भविष्य का फैसला जुड़ा है.
30 साल से बंद हैं टाटीसिलवे और सामलौंग की फैक्ट्रियां
उल्लेखनीय है कि राजधानी रांची के टाटीसिलवे स्थित इलेक्ट्रिक इक्विपमेंट फैक्टरी (इइएफ) और सामलौंग स्थित हाइटेंशन इंसुलेटर फैक्टरी बीते करीब 30 वर्षों से पूरी तरह बंद पड़ी हैं. इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले कर्मचारियों को उनके मूल वेतन, ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट (छुट्टियों के बदले मिलने वाली राशि) का पूरा भुगतान अब तक नहीं मिला है. कर्मचारी पाई-पाई को मोहताज हैं और बकाया मिलने की उम्मीद में सालों से अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं. इस मामले में वर्तमान में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरीय अधिवक्ता आरएन सहाय कोर्ट में पक्ष रख रहे हैं.
बेदखली के नोटिस से गहराया 200 परिवारों पर संकट
एक तरफ जहां कर्मियों को उनका वेतन और ग्रेच्युटी नहीं मिली है, वहीं दूसरी तरफ दो वर्ष पहले कारखाना प्रबंधन ने आवासीय परिसर खाली करने का नोटिस थमा दिया. इइएफ और हाइटेंशन इंसुलेटर फैक्टरी के करीब 200 आवासों में ये कर्मचारी या उनके आश्रित पिछले लगभग 50 वर्षों से निवास कर रहे हैं. कारखाना पूरी तरह बंद हो जाने के बाद कर्मियों की मांग है कि उन्हें एचइसी (HEC) और बोकारो स्टील सिटी की तर्ज पर ये आवास दीर्घकालीन लीज पर दे दिए जाएं. इसी मांग को लेकर कर्मियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है.
2007 में लीज देने का लिया गया था निर्णय
हैरानी की बात यह है कि कर्मचारियों को आवास लीज पर देने का फैसला बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम (बीएसआईडीसीएल) के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक में 12 जून 2007 को ही लिया जा चुका है (संकल्प संख्या-294/4742). इसके बावजूद इस निर्णय को धरातल पर लागू नहीं किया गया और कर्मचारियों को बेघर करने की स्थिति उत्पन्न हो गई.
भीख मांगने और रिक्शा चलाने को मजबूर कर्मचारी
वेतन भुगतान बंद रहने के कारण इन कर्मचारियों का जीवन अत्यंत कष्टदायक और सोचनीय रहा है. बकाया राशि का भुगतान इतनी धीमी गति से हुआ कि कर्मियों के सामने जीवन यापन का गहरा संकट खड़ा हो गया. उदाहरण के तौर पर, इइएफ के कर्मियों को 1998 के केवल दो महीनों (मई और जून) का वेतन जुलाई 2011 में जाकर मिला. आर्थिक तंगी के कारण कई कर्मचारी समय पर इलाज न मिलने से असामयिक मौत के मुंह में समा गए. बच्चों की पढ़ाई छुड़ाकर उन्हें बाल मजदूरी में लगाना पड़ा. पेट भरने के लिए बुजुर्ग कर्मचारियों ने सब्जियां बेचीं, रिक्शा चलाया और कई लोगों को भीख तक मांगने पर मजबूर होना पड़ा. प्रभात खबर समेत अन्य प्रमुख समाचार पत्रों ने लगातार इस मानवीय त्रासदी को प्रमुखता से उठाया है.
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90 वर्ष के बुजुर्ग ने बयां किया दर्द
ईईएफ और हाइटेंशन रिटायर्ड एम्प्लॉयज एसोसिएशन के बैनर तले आवासों को लीज पर देने की लड़ाई लड़ी जा रही है. एसोसिएशन के महासचिव एसएस प्रसाद ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि वे वर्ष 1997 में सेवानिवृत्त हुए थे. उस समय उनका विभिन्न बकाए मदों में करीब 4 लाख रुपये बाकी था, जो आज तक नहीं मिला. 1997 के 4 लाख रुपये की कीमत वर्ष 2026 में क्या रह गई है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. 90 वर्ष की अवस्था में पहुंच चुके एसएस प्रसाद कहते हैं कि सरकार अब पैसे देकर घर खाली करने को कह रही है, लेकिन इस उम्र में वे और उनके जैसे सैकड़ों बुजुर्ग कहां जाएंगे? यह केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं है, बल्कि उन 200 आवासों में रह रहे सभी लाचार बुजुर्गों और उनके परिवारों की कड़वी सच्चाई है, जिन्हें अब 30 जुलाई को हाईकोर्ट से न्याय की आस है.
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