गुवा गोलीकांड के असली नायक बहादुर उरांव और भुवनेश्वर महतो

गुवा गाेलीकांड झारखंड आंदाेलन की वह घटना है, जिससे पूरे काेल्हान काे उद्वेलित कर दिया था. इस गाेलीकांड के बाद काेल्हान में झारखंड आंदाेलन में तेजी आयी थी. राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड आंदाेलन चर्चित हाे गया था

गुवा गाेलीकांड झारखंड आंदाेलन की वह घटना है, जिससे पूरे काेल्हान काे उद्वेलित कर दिया था. इस गाेलीकांड के बाद काेल्हान में झारखंड आंदाेलन में तेजी आयी थी. राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड आंदाेलन चर्चित हाे गया था. कारण था 8 सितंबर, 1980 काे गुवा में अस्पताल परिसर में लाइन से खड़ा कर आठ आदिवासियाें काे पुलिस ने मार डाला था.

कुछ घंटे पहले ही गुवा बाजार में पुलिस और आंदाेलनकारियाें में संघर्ष हुआ था. पुलिस ने फायरिंग कर तीन आदिवासियाें काे मार डाला था, जबकि आदिवासियाें के तीर से चार पुलिसकर्मी भी मारे गये थे.

देश की यह पहली घटना थी, जब इलाज करा रहे आदिवासियाें काे अस्पताल से निकाल कर गाेलियाें से भून दिया गया था. उस दिन पुलिस फायरिंग में कुल 11 आदिवासी मारे गये थे. इनका दाेष सिर्फ इतना था कि ये अलग राज्य की मांग कर रहे थे, अन्याय का विराेध कर रहे थे, माइंस में स्थानीय लाेगाें की बहाली की मांग कर रहे थे, माइंस से निकले लाल पानी के कारण खराब हुए खेताें काे मुआवजा मांग रहे थे.

बदले में मिली थी गाेली.पूरी घटना में दाे आंदाेलनकारी नायक बन कर उभरे थे. गाेलीकांड के 42 साल बाद भी दाेनाें आंंदाेलनकारी झारखंड में सक्रिय हैं. एक हैं चक्रधरपुर के बहादुर उरांव आैर दूसरे हैं भुवनेश्वर महताे. बहादुर उरांव की गिरफ्तारी के बाद आंदाेलनकारियाें ने पुलिस के कब्जे से उन्हें छुड़ाने का प्रयास किया था. इसी क्रम में पुलिस आैर आंदाेलनकारियाें में संघर्ष हुआ था.

फायरिंग में तीन आदिवासी घटनास्थल पर ही मारे गये थे. आंदाेलनकारियाें ने पुलिस पर तीराें की बारिश कर चार जवानाें काे मार डाला था आैर बहादुर उरांव काे छुड़ा लिया था. बहादुर उरांव ने भाग कर पहाड़ लांघ कर जाेजाेहातू के एक घर में छिप कर जान बचायी थी.

रामेश्वर उरांव ने बचायी थी भुवनेश्वर महतो की जान :

गुवा के नायकाें में दूसरा नाम आता है भुवनेश्वर महताे का. अभी वे झारखंड आंदाेलनकारी चिन्हितीकरण आयाेग के सदस्य हैं आैर खाेज-खाेज कर झारखंड आंदाेलनकारियाें की पहचान में लगे हैं. आठ सितंबर की फायरिंग के बाद भुवनेश्वर महताे काे उस दिन गिरफ्तार कर लिया था आैर उनका एनकाउंटर करना चाहती थी.

गिरफ्तार भुवनेश्वर महताे काे पुलिस लेकर चाईबासा जा रही थी. बीएमपी का गुस्सा चरम पर था आैर वह भुवनेश्वर महताे काे अपने कब्जे में लेना चाहती थी. जान बचायी थी डॉ रामेश्वर उरांव ने. वे झारखंडियाेें आैर आंदाेलनकारियाें के तीसरे नायक के ताैर पर उभरे थे. उन दिनाें डॉ रामेश्वर उरांव (अभी झारखंड सरकार में कांग्रेस काेटा से मंत्री हैं) सिंहभूम के पुलिस अधीक्षक थे. उन्हाेंने बीएमपी का गुस्सा शांत कराने के लिए भुवनेश्वर के साथ मारपीट भी की.

लेकिन उन्हें बीएमपी काे नहीं साैंपा. अगर उस दिन डॉ रामेश्वर उरांव ने भुवनेश्वर महताे काे बीएमपी के हाथाें में दे दिया हाेता ताे भुवनेश्वर शायद जिंदा नहीं हाेते. डॉ रामेश्वर उरांव ने उस दिन एक झारखंडी हाेने का फर्ज निभाया था.

गुवा के अासपास के गांवों में बरपा था पुलिस का कहर : भले ही बहादुर बाबू आैर भुवनेश्वर महतो किसी प्रकार बच गये थे, लेकिन गुवा के अासपास के गांवाें में पुलिस का कहर बरपा था. झारखंड आंदाेलन के प्रति नरम रुख रखनेवाले अधिकारियाें का तबादला कर दिया गया था. सरकार ने तीर-धनुष पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन संसद में विराेध हाेने के बाद इस निर्णय काे वापस लेना पड़ा था. हर साल आठ सितंबर काे गुवा में शहीदाें की याद में कार्यक्रमाें का आयाेजन किया जाता है. इस गाेलीकांड में शहीद हुए आदिवासियाें के परिजनाें काे कुछ साल पहले हेमंत साेरेन की सरकार ने नाैकरी दी थी.

जुड़वां बेटों काे खोया था बहादुर बाबू ने

बहादुर उरांव फरार थे. पुलिस उन्हें खाेज रही थी और दबाव बनाने के लिए कुर्की जब्ती की थी. पत्नी काे घर से निकाल दिया था. बहादुर बाबू की पत्नी अपनी गाेद में जुड़वां बेटे काे लेकर ठंड के माैसम में रात भर खुले आसमान में पड़ी रही थी. ठंड से बहादुर बाबू के दाेनाें बच्चाें ने दम ताेड़ दिया था. इतनी बड़ी कुर्बानी देनेवाले बहादुर बाबू आज भी उसी तेवर में जीते हैं. दुर्घटना में घायल हाेने के बावजूद बैसाखी के सहारे वे शिबू साेरेन से मिलने हाल में रांची आये थे. मुलाकात नहीं हाे सकी. बहादुर बाबू अब नवंबर में झारखंड की तरह सभी केंद्रीय कर्मचारियाें काे पेंशन देने के लिए दिल्ली में एक दिन की भूख हड़ताल करने का फैसला किया है. उम्र है उनकी लगभग 88 साल, लेकिन जज्बा पहले जैसा.

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