Elephant Attack in Jharkhand : हाथियों के हमले में 25 साल में 1500 से ज्यादा मरे, रांची सबसे अधिक प्रभावित
Elephant Attack in Jharkhand : गजराज और मानव के बीच टकराव झारखंड में बड़ी त्रासदी में तब्दील हो रहा है. डब्ल्यूआइआइ ने इसका अध्ययन किया. 2000 से 2023 के बीच राज्य में हाथियों के हमले की 1740 घटनाएं हुईं. 2023 के बाद करीब 200 लोगों की जान अब तक हाथी के कारण चली गयी.
Elephant Attack in Jharkhand : (मनोज सिंह) झारखंड में हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ता टकराव अब एक बड़ी त्रासदी का रूप ले चुका है. भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) के हालिया अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2000 से 2023 के बीच राज्य में हाथियों के हमले की 1740 घटनाएं दर्ज हुई हैं. इनमें 1340 लोगों की मौत हो गयी और 400 लोग घायल हुए हैं. 2023 के बाद अब तक करीब 200 लोगों की जान हाथियों के कारण चली गयी है. इस क्रम में पिछले 25 वर्षों में करीब 1500 से अधिक लोगों की मौत हाथियों के कारण हो चुकी है. जिसे लेकर राज्य सरकार से लेकर विशेषज्ञ तक चिंतित हैं.
डब्ल्यूआइआइ ने अपने अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष और शोध में झारखंड के रांची, खूंटी और पूर्वी सिंहभूम जिले को संघर्ष के लिए सबसे बड़ा हॉटस्पॉट माना है. केवल रांची में ही अब तक (2023 तक) सबसे अधिक 391 मौतें और 194 घायल होने के मामले सामने आये हैं. इसके बाद खूंटी (131 मौतें) और पूर्वी सिंहभूम (68 मौतें) का स्थान आता है. आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चला है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों के हताहत होने की संख्या काफी अधिक रही है. झारखंड के लगभग 480 गांव इस समस्या से सीधे प्रभावित हैं. जिनमें रांची के सर्वाधिक 156 गांव शामिल हैं. शोधकर्ताओं ने रमुआ, चटमबारी, गेरापोखर और कोडरमा जैसे उच्च-संघर्ष वाले गांवों में तत्काल सुरक्षा हस्तक्षेप की आवश्यकता जतायी है. अध्ययन में माना गया है कि मॉनसून में खतरा अधिक बढ़ जाता है. संघर्ष के पीछे के मुख्य कारण राज्य में हाथियों के प्राकृतिक आवास (हैबिटेट) का नुकसान पहुंचना भी शामिल है. खनन और शहरीकरण का असर भी है. धनबाद, हजारीबाग और पश्चिमी सिंहभूम जैसे क्षेत्रों में कोयला खनन और औद्योगिक विकास ने हाथियों के पुराने रास्तों (एलीफेंड कॉरिडोर) को बाधित कर दिया है.
| वर्ष | आदमी की मौत | मृत हाथी |
|---|---|---|
| 2019-20 | 84 | 10 |
| 2020-21 | 74 | 9 |
| 2021-22 | 133 | 3 |
| 2022-23 | 96 | 10 |
| 2023-24 | 87 | 6 |
| 2024-25 | 81 | 15 |
| 2025-26 | 30 | 5 |
झारखंड में ही दो जनवरी को चाईबासा में हाथियों ने तीन लोगों की जान ले ली. दिसंबर माह में रामगढ़ के वेस्ट बोकारो (घाटो) और सिरका वन क्षेत्र में 16 और 17 तारीख को चार लोगों की मौत हाथियों के हमले में हुई. इसमें अमित रजवार, अमूल महतो, सावित्री देवी और पार्वती देवी शामिल थे. इसके कुछ दिनों बाद रामगढ़ के ही कर्मा सुगिया इलाके में लोकनाथ मुंडा नामक एक व्यक्ति की जान चली गयी. दिसंबर में ही रांची के अनगड़ा ब्लॉक के जीदू गांव में शनिचरवा मुंडा नामक व्यक्ति की हाथी के हमले में मौत हो गयी.
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के विभिन्न जिलों, विशेषकर कोल्हान, संताल परगना और पलामू प्रमंडल में हाथियों के हमले में जान गंवाने वालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. हाथियों से लोगों की मौत के मामले में रांची जिला अव्वल है. यहां सबसे अधिक इंसानों की मौत हाथियों के कारण हो रही है.
औसतन हर वर्ष 80 से 100 लोगों की मौत हाथियों के हमले में
वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में औसतन हर वर्ष 80 से 100 लोगों की मौत हाथी के हमले हो रही है. रांची के बुंडू-तमाड़ क्षेत्र, लोहरदगा, लातेहार और गिरिडीह जैसे जिलों में स्थिति सबसे ज्यादा भयावह है. हाथियों के झुंड न केवल फसलों को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि रात के अंधेरे में गांवों में घुसकर घरों को भी ध्वस्त कर रहे हैं. ग्रामीण अब रातें जागकर बिताने को मजबूर हैं. वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले आठ वर्षों में करीब 60 हाथियों की मौत भी विभिन्न कारणों से हो गयी है. इसमें रेलवे लाइन और बिजली के तार अहम कारण हैं. लोग हाथियों से बचने के लिए अपने खेतों में बिजली का तार लगा देते हैं. जिसकी चपेट में आने से हाथियों की मौत हो जा रही है.
इसलिए आक्रामक हो रहे गजराज
प्राकृतिक आवास का विनाश : अवैध उत्खनन और शहरीकरण के कारण हाथियों के प्राकृतिक गलियारे बिगड़ गये हैं. उनके रहने की जगह सिमटती जा रही है.
भोजन और पानी की कमी : जंगलों में पर्याप्त भोजन नहीं मिलने से हाथी गांवों की ओर रुख करते हैं, जहां उन्हें खेतों में लहलहाती फसलें और घरों में रखा अनाज आसानी से मिल जाता है.
हाथियों के मार्ग में अवरोध : रेलवे लाइनों का बिछना और चौड़ी सड़कों के निर्माण ने हाथियों के पारंपरिक रास्तों को रोक दिया है. जिससे वे भटक कर रिहायशी इलाकों में पहुंच जाते हैं.
आर्थिक नुकसान और मुआवजे की जटिलता : हाथियों का उत्पात केवल जान तक सीमित नहीं है. गरीब किसानों की साल भर की मेहनत यानी उनकी फसलें मिनटों में रौंद दी जाती हैं.
वन विभाग की पहल और चुनौतियां
एलीफेंट विलेज : हाथियों को जंगलों में ही रोकने के लिए तालाबों और चारे के पौधों का रोपण.
क्विक रिस्पांस टीम (क्यूआरटी) : हाथियों को भगाने के लिए प्रशिक्षित टीमों की तैनाती.
जागरूकता अभियान : ग्रामीणों को हाथियों के व्यवहार और उनसे बचने के तरीकों के बारे में जानकारी देना.
हाथी को भी उसके मिजाज से जीने दें
हाथी से मौत की अधिकतर घटनाएं लोगों की नादानी के कारण हो रही हैं. लोग हाथियों के पीछे भागने लगते हैं. हाथी कभी झुंड को नुकसान नहीं करता है. एक-दो को मारता है. इससे बचने के लिए हाथियों के नजदीक जाने से बचना चाहिए. हाथी को भी अपने मिजाज से जीने देना चाहिए. ग्रामीणों की समस्या उनकी संपत्ति की क्षति है. संपत्ति (चल-अचल) का मुआवजा अगर सामान्यजनक होगा, तो ग्रामीण भी हाथियों को भगाने या अन्य गतिविधियों में शामिल नहीं रहेंगे. हाथियों का अपना नेचर है. वह किसी भी इलाके में एक या दो दिन से ज्यादा नहीं रहता है. विभाग भी हाथियों पर नजर रख रहा है. कई तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है.
एके सिंह, पूर्व पीसीसीएफ (वन्य प्राणी)
खलिहान में सोये बालक को हाथी ने कुचला
पश्चिमी सिंहभूम जिले में शुक्रवार की रात में हाथी ने खलिहान में सो रहे बालक को कुचल कर मार डाला. वहीं 10 वर्षीया बच्ची गंभीर रूप से घायल है. घटना चाईबासा-गोइलकेरा मार्ग पर सैयतवा वन क्षेत्र की है. मृतक की शिनाख्त गोइलकेरा के बाइपी गांव निवासी मंदुरुकामय के 13 वर्षीय पुत्र रेगा कयोम के रूप में हुई. वहीं घायल बच्ची झींगी गागराई बाइपी गांव के नंदु गागराई की बेटी है. बच्ची के दोनों पांव जख्मी हैं. बच्ची को इलाज के लिए चक्रधरपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
अहम तथ्य
1. वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि आठ वर्षों में 60 हाथियों की भी मौत हुई
2. हाथियों की मौत में रेलवे लाइन और बिजली के तार अहम कारण बन रहे
3. रांची में 2023 तक सबसे अधिक 391 मौतें हुईं और 194 लोग घायल हुए
4. झारखंड के 480 गांव सीधे प्रभावित हैं, जिनमें रांची के सर्वाधिक 156 गांव शामिल हैं.
