पिठोरिया से सुजीत कुमार केशरी की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में झारखंडी भाषाओं को प्राथमिकता देने तथा गैर-झारखंडी भाषाओं को विषय सूची से हटाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है. इसी मुद्दे को लेकर शुक्रवार को रांची स्मार्ट सिटी स्थित मंत्री योगेंद्र प्रसाद के आवास पर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई. बैठक में खोरठा साहित्य संस्कृति परिषद् और विभिन्न भाषाई संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.
बैठक में प्रतियोगी परीक्षाओं के महत्व पर चर्चा
बैठक में झारखंड की स्थानीय और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रतियोगी परीक्षाओं में उनके महत्व को लेकर विस्तार से चर्चा हुई. प्रतिनिधियों ने मंत्री के समक्ष कई तर्क रखते हुए कहा कि राज्य की पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए झारखंडी भाषाओं को प्राथमिकता देना जरूरी है.
डॉ बीएन ओहदार के नेतृत्व में पहुंचा प्रतिनिधिमंडल
यह विचार-विमर्श खोरठा साहित्य संस्कृति परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ बीएन ओहदार की अगुवाई में हुआ. बैठक में राधा गोबिंद विश्वविद्यालय के खोरठा विभागाध्यक्ष अनाम ओहदार, दुबराज महतो, अधिवक्ता विक्की कुमार साव समेत कई भाषाविद और खोरठा परिषद् के प्रतिनिधि मौजूद थे. प्रतिनिधिमंडल ने पांच मंत्रियों की उच्च स्तरीय समिति के सदस्य और मंत्री योगेंद्र प्रसाद के समक्ष अपनी बात विस्तार से रखी. प्रतिनिधियों ने कहा कि झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थानीय भाषाओं को मजबूत स्थान देना समय की आवश्यकता है. उनका मानना है कि इससे राज्य के मूल निवासियों और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा.
गैर-झारखंडी भाषाओं को हटाने की उठी मांग
बैठक का मुख्य मुद्दा था कि भोजपुरी, मगही, अंगिका, मैथिली, उड़िया, बांग्ला और उर्दू जैसी भाषाओं को जेटेट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की विषय सूची से हटाया जाए. प्रतिनिधियों का कहना था कि ये भाषाएं झारखंड की मूल भाषाएं नहीं हैं और इनका राज्य के अलग सांस्कृतिक अस्तित्व से सीधा संबंध नहीं है.
भाषाविदों ने दिया तर्क
भाषाविदों ने तर्क दिया कि झारखंड राज्य का गठन बिहार से सांस्कृतिक और भाषाई भिन्नता के आधार पर हुआ था. ऐसे में राज्य की पहचान को मजबूत करने के लिए यहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. उनका कहना था कि झारखंड की असली सांस्कृतिक अभिव्यक्ति केवल खोरठा, नागपुरी, कुरमाली, पंचपरगनिया और जनजातीय भाषाओं के माध्यम से ही संभव है.
पलामू क्षेत्र की भाषा को लेकर भी रखे गए तर्क
बैठक में पलामू प्रमंडल की भाषाई पहचान को लेकर भी चर्चा हुई. प्रतिनिधियों ने दावा किया कि पलामू क्षेत्र की मूल भाषा ‘पलमुआ’ है, जो खोरठा और नागपुरी भाषा का ही क्षेत्रीय रूप है. उन्होंने कहा कि इस भाषा पर भोजपुरी और मगही का हल्का प्रभाव जरूर है, लेकिन इसे भोजपुरी या मगही कहना उचित नहीं होगा. प्रतिनिधियों के अनुसार पलामू प्रमंडल में खोरठा के क्षेत्रीय स्वरूप को ‘देसवाली’ नाम से भी जाना जाता है. उन्होंने कहा कि इस भाषाई पहचान को समझे बिना बाहरी भाषाओं को बढ़ावा देना झारखंड की सांस्कृतिक भावना के खिलाफ है.
झारखंड आंदोलन में भूमिका को लेकर सवाल
बैठक के दौरान भाषाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने झारखंड अलग राज्य आंदोलन का भी उल्लेख किया. प्रतिनिधियों ने कहा कि भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं की झारखंड आंदोलन में कोई भूमिका नहीं रही. उनका दावा था कि इन भाषाओं में आंदोलन से जुड़ी कोई महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना उपलब्ध नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि आज भी झारखंड में इन भाषाओं की कोई बड़ी साहित्यिक या भाषाई गतिविधि दिखाई नहीं देती. प्रतिनिधियों का कहना था कि स्थानीय संदर्भों में इन भाषाओं का साहित्य भी लगभग नहीं के बराबर है.
परीक्षाओं को प्रभावित करने का लगाया आरोप
भाषाविदों ने आरोप लगाया कि कुछ समूह केवल प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर जेटेट के समय ही इन बाहरी भाषाओं का मुद्दा उठाते हैं. उनका कहना था कि इससे भाषाई विवाद खड़ा कर नियुक्तियों और परीक्षाओं को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है. प्रतिनिधियों ने यह भी दावा किया कि बिहार में भी भोजपुरी, मगही और अंगिका को प्रतियोगी परीक्षाओं में विशेष स्थान नहीं मिला है. वहां इन भाषाओं की पढ़ाई और अकादमिक व्यवस्था सीमित है. ऐसे में झारखंड में इन्हें प्राथमिकता देना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता.
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मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने दिया आश्वासन
बैठक के अंत में मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना. उन्होंने आश्वस्त किया कि सभी सुझावों और मांगों को उच्च स्तरीय समिति के समक्ष रखा जाएगा. मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार स्थानीय भाषा और संस्कृति के संरक्षण को लेकर गंभीर है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि झारखंड के मूल निवासियों और स्थानीय भाषा के विद्यार्थियों के हितों की रक्षा के लिए उचित निर्णय लेने पर विचार किया जाएगा. इस बैठक के बाद झारखंड में भाषा और पहचान की राजनीति को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
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