Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने 1993 के 300 रुपये रिश्वत मामले में CBI अदालत की ओर से सुनायी गयी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में राहत दी है. अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के पर्याप्त साक्ष्य हैं, इसलिए दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता. हालांकि, घटना को तीन दशक से अधिक समय बीत जाने और आरोपी के पहले से एक माह एक दिन जेल में रहने समेत अन्य परिस्थितियों को देखते हुए दो साल के कारावास की सजा घटाकर पहले से काटी गयी अवधि तक सीमित कर दी. साथ ही पहले जमा जुर्माने और जमानत की शर्त के तहत जमा पांच हजार रुपये को भी पर्याप्त माना.
धनबाद में PF एरियर पास करने के लिए मांगी थी रिश्वत
मामला धनबाद के बासुदेवपुर कोलियरी का है. शिकायतकर्ता रामधारी हरिजन ने 22 मार्च 1993 को CBI में शिकायत दर्ज करायी थी कि तत्कालीन फंड क्लर्क समीर कुमार चौधरी ने CMPF एरियर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए 300 रुपये रिश्वत मांगी है. शिकायत के सत्यापन के बाद CBI ने उसी दिन ट्रैप बिछाया और आरोपी को कथित रूप से रिश्वत लेते हुए पकड़ लिया.
ट्रैप में रंगे हाथ पकड़ने का दावा
CBI के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोपी को 300 रुपये के फिनॉल्फ्थेलीन लगे नोट दिये. आरोपी ने नोट गिनकर अपनी मेज की बायीं दराज में रख दिये. तय संकेत मिलने पर ट्रैप टीम पहुंची और दराज से वही नोट बरामद किये. हाथ धोने पर घोल गुलाबी हो गया और CFSL की जांच में फिनॉल्फ्थेलीन तथा सोडियम कार्बोनेट की पुष्टि हुई.
2005 में हुई थी दोषसिद्धि
CBI की विशेष अदालत ने 26 फरवरी 2005 को आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(d) सहपठित धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराते हुए दो-दो वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनायी थी. सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था.
हाईकोर्ट ने खारिज की अपील
अपील में आरोपी ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास, ट्रैप प्रक्रिया में खामियां और रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने की दलील दी. अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की समीक्षा के बाद कहा कि बताये गये विरोधाभास इतने गंभीर नहीं हैं कि अभियोजन की पूरी कहानी अविश्वसनीय हो जाए. अदालत ने माना कि रिश्वत की मांग और स्वीकार करने का आरोप साक्ष्यों से सिद्ध होता है, इसलिए दोषसिद्धि कायम रहेगी.
सजा में मिली राहत
न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने कहा कि घटना 1993 की है और आरोपी तीन दशक तक मुकदमे की प्रक्रिया से गुजर चुका है. उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है. अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी एक माह एक दिन जेल में रह चुका है और जुर्माने के अलावा जमानत की शर्त के तहत पांच हजार रुपये भी जमा कर चुका है. इन परिस्थितियों में सजा को पहले से काटी गयी अवधि और जमा सात हजार रुपये तक सीमित कर दिया गया, जबकि दोषसिद्धि बरकरार रखी गयी.
