समय के साथ मेंटल हेल्थ का ट्रेंड काफी बदल गया है. इसमें मानसिक बीमारी सामान्य हो गयी है. हर चार में से एक व्यक्ति किसी ने किसी मोड़ पर मानसिक व न्यूरो संबंधित विकारों से प्रभावित है.
अक्सर जिन लोगों को हम आम भाषा में सेंटी (भावुक) कह देते हैं, वैसे लोग अब मेंटल पेशेंट (मानसिक रोगी) बन रहे हैं. अवसाद के कारण आत्महत्या के केस बढ़ रहे हैं. स्मार्ट फोन के असामान्य इस्तेमाल ने परेशानी बढ़ रही है. इनसे लोगों के हाव-भाव तेजी से बदल रहा है.कई लोग तो इस वजह से पर्सनालिटी डिसऑर्डर (दोहरी मानसिकता) से ग्रसित होने लगे हैं. इस तरह के केस तेजी से सामने आ रहे हैं.
मनोचिकित्सक की मानें, तो प्रति दिन सात से 10 मरीज इससे निजात पाने के लिए आते हैं. मेंटल हेल्थ पर समाज में जागरूकता फैलाने के लिए फिल्में भी बनायी जा रही हैं. पेश है वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे पर पूजा सिंह और अभिषेक रॉय की रिपोर्ट…
अधिकांश मानसिक बीमारियों को पहचानना भी मुश्किल है. मानसिक रोग या पागलपन एक ऐसा शब्द है, जिससे इसके कारणों एवं उपचार के विषय में कई भ्रांतियां और आशंकाएं जुड़ी हैं. कुछ लोग इसे असाध्य, आनुवांशिक व छूत की बीमारी तक कहते हैं. तो कुछ जादू-टोना, भूत-प्रेत डायन का प्रकोप बता कर रोगी की स्थिति और खराब कर देते हैं.
अज्ञानता के चलते उपचार की बजाये तांत्रिकों के पास भटकते हैं. न्यूरो साइकेट्रिक डॉ पवन बर्णवाल ने बताया कि इस तरह के केस प्रतिदिन बढ़ रहे हैं. सात से 10 मरीज इसके इलाज के लिए पहुंच रहे हैं. इसका इलाज दवा, साइकोथेरिपी से किया जा सकता है. इसका आसान इलाज है. लोगों को बताना होगा कि इसकी दवा भी उपलब्ध है, जिसे 15 दिनों से लेकर एक महीने तक चलता है.
स्ट्रेस के कारण बढ़ती है परेशानी : मेंटल हेल्थ के तहत अधिक प्रेशर होने कारण व्यक्ति दो रूप में आ जाता है या कहें कि भूत-पिचास का अपने शरीर पर आने जैसे बाते करने लगता है. मनोचिकित्सक के अनुसार यह एक मानसिक बीमारी, जो अधिक स्ट्रेस के कारण उत्पन्न होता है. इसके पीछे कई कारण होते है. मुख्य रूप से सामाजिक और साइकोलॉजिकल कारण पाये जाते हैं. पारिवारिक तनाव, घर में किसी की मृत्यु, किसी तरह का आघात आदि है. यह केस महिलाओं में अधिक देखी जा सकता है.
खूंटी व हजारीबाग में कैंप में होता है इलाज : रिनपास खूंटी व हजारीबाग में कैंप का आयोजन होता है. आसपास के मरीजों का इलाज कैंप के माध्यम से होता है.
खूंटी में हर माह के दूसरे मंगलवार तथा हजारीबाग में चौथे मंगलवार के कैंप का आयोजन होता है. खूंटी में हर कैंप में करीब 600 मरीज इलाज के लिए आते हैं. इसी तरह हजारीबाग में करीब एक हजार मरीज इलाज के लिए आते हैं.
कराना चाहिए साइकोलॉजी टेस्ट : मनोचिकित्सक बताते हैं कि हर आदमी को जब लगे कि वह अपने अंदर कुछ कमी महसूस कर रहे हैं. काम करने की क्षमता कम हो रही है, तो वह मनोवैज्ञानिक की सलाह ले सकते हैं. मनोवैज्ञानिक दवा नहीं देते हैं. उनसे साइकोलॉजिकल टेस्ट कराना चाहिए. इससे काम करने की क्षमता कम होने का कारण खोजा जा सकता है. इस कमी को दूर करने के उपाय भी बताये जा सकते हैं.
फिल्म से जागरूकता की पहल : हाल के दिनों में कंगना रनाउत और राजकुमार राव की फिल्म ‘जजमेंटल है क्या’ ने लोगों का ध्यान खिंचा था. जबकि मनोचिकित्सक बताते हैं कि इस तरह केस सामान्य है. अवसाद में ज्यादा समय तक रहने और समय पर इलाज न होने से बीमारी बढ़ जाती है. इससे लोग सेवियर डीप्रेशन विद साइकॉटिक सिप्टम में पहुंच जाते है, जहां आत्महत्या करने की इच्छा प्रबल हो जाती है.
जबकि फिल्म से मानसिक रोगियों को ठीक करने की पहल राजधानी में भी शुरू हो गयी है. रांची की टीम अखड़ा, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री (सीआइपी) और एकजुट की ओर से तीन दिवसीय फिल्म फेस्टिवल अनुभव का आयोजन 28 जुलाई से 30 जुलाई तक किया गया था. इसमें लोगों को कासव, अस्तु, आइ एम जीजा और अ ब्यूटीफूल माइंड जैसी फिल्में दिखायी गयी थी. जिनमें अल्जाइमर्स, डिमेंशिया, डिप्रेशन, सिजोफ्रेनिया, ऑटिज्म, फोबिया जैसे मेंटल हेल्थ इस्यू से ग्रसित व्यक्ति के लक्षण को दिखाने की कोशिश की गयी थी.
फैक्ट फिगर
चार में से एक व्यक्ति को अपने जीवन में मानसिक रोग का सामना करना होगा
एक साल में आठ लाख लोग मानसिक रोग से पीड़ित होकर करते हैं आत्महत्या
मानसिक रोग की वजह से 15 साल के किशोर भी कर ले रहे हैं आत्महत्या
ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडीज के अनुसार सालाना दो लाख यंग एडल्ट हर साल आत्महत्या करते हैं.
कुछ सामान्य डिसऑर्डर
सेवियर डिप्रेसिव डिसऑर्डर
इसमें आत्महत्या की इच्छा प्रबल हो जाती है. इससे वैसे लोग ग्रसित होते हैं, जो लंबे समय से खुद को हेल्पलेस, वर्कलेस और होपलेस महसूस करते हैं.
डिप्रेसिव डिसऑर्डर या एपिसोड
सामाजिक लोगों से कटाव और अकेले रहना. कामकाज में असामान्यता, स्कूल या काम पर न जाने की इच्छा, खेल आदि में अरुचि, स्कूल में असफल रहना आदि.
एंजाइटी डिसऑर्डर
एकाग्रता में कमी, याददाश्त कमजोर होना या समझने में मुश्किल होना. गंध, स्पर्श व नये जगह के प्रति अधिक संवेदनशीलता व उत्तेजना के कारण विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने के प्रति उदासीनता.
सेवियर डिप्रेशन विद साइकॉटिक सिप्टम
लंबे समय से सेवियर डिप्रेसिव डिसऑर्डर, डिप्रेसिव डिसऑर्डर या एपिसोड और एंग्जाइटी डिसऑर्डर के होने से यह समस्या हो जाती है. इससे किसी भी परिवेश में घबराहट, नकारात्मक सोच से घिरे रहना आदि होता है. इन सब के ज्यादा हो जाने से लोगों को पैनिक अटैक आते हैं और खुद को मारने (आत्महत्या) की इच्छा रहती है.
मानसिक रोग का उपचार संभव है, अगर लोग सही नजरिया रखें
भूत, प्रेत, डायन के हावी होने की बातें लोगों के बीच चर्चा का विषय बनती है. इसमें लोगों का व्यवहार असामान्य हो जाता है. हाव-भाव में बदलाव और बातचीत का तरीके में बदलाव सामान्य लक्षण है. जबकि ऐसे लोग मानसिक रोग से ग्रसित होते हैं, जिसे ट्रांस एंड पोजिशन डिसऑर्डर के अंतर्गत देखा जाता है. इस मानसिक बीमारी के अंतर्गत वह अपने आप को एक अजनबी की तरह महसूस करते हैं. लेकिन, उनको अपने आसपास की सारी जानकारी होती है. यह महसूस करते है कि उनके भीतर अलग-अलग लोग हैं. अपने आप को हम के रूप में संदर्भित करना चरित्र से बाहर का व्यवहार और दूसरी आवाजें निकलने लगते हैं. इसका भी इलाज संभव है़
डॉ भूमिका सच्चर, कंसल्टेंट मनोवैज्ञानिक
लोग अपने अंदर के खीज को बाहर निकालने के लिए अजीब सी हरकत करने लगते हैं. कोई भूत-पिचास के नाम पर नाटकीय व्यवहार करने लगते हैं. जोर-जोर से चिल्लाना, आवाज निकालना जैसे हरकत करने लगते हैं. ऐसे परिस्थिति में मरीज को ठीक केवल दवा से किया जा सकता है. यह डीप रूटेट साइकोलॉजिकल बीमारी है. इसे डिसोसिएटिव डिसऑर्डर कहते हैं. डिवोशनल के तौर पर धार्मिक प्लेस पर जाते हैं. कम समय में व्यवहार का बदल जाता है. मरीज की मनोदशा को देखते हुए सर्वप्रथम मनोचिकित्सक से संपर्क किया जाना चाहिए. यह एक मानसिक बीमारी में से एक है, जिसे दवा से दूर किया जा सकता है.
डॉ सिद्धार्थ सिन्हा, वरीय मनोवैज्ञानिक, रिनपास
अकेले में बातें करना, फील करना की कोई उसकेपीछे खड़ा है या उसके शरीर पर आत्मा का वास हैया फिर भगवान का शरीर पर आना. इस तरह के केस ज्यादातर महिलाओं में देखी जा सकती है. सिजाफ्रेनिया के अंतर्गत साइकोसिस में मरीज एक समय में अपने आप को भगवान मानने लगता है. यह थोड़ी देर के लिए होता है. जो की मानसिक स्ट्रेस के कारण होता है. अधिक मानसिक स्ट्रेस को सहन नहीं कर पाने के कारण वह दो पर्सनालिटी को जीने लगते हैं. यह एक मानसिक बीमारी है, जिसका इलाज संभव है. मानसिक रोग के प्रति संवेदनशील होना होगा.
डाॅ पवन कुमार बर्णवाल, न्यूरो साइकेट्रिस्ट
सवाल जो युवा अक्सर पूछते हैं…
रांची : मानसिक बीमारियों की िवभिन्न पहलुओं को लेकर मनोिवशेषज्ञ डॉ अनुराधा वत्स से बातचीत की गयी. इसमे डॉ वत्स ने युवाओं द्वारा उनसे पूछे गये सवालों और इसके जवाब के बारे में बताया.
सवाल : भविष्य और वर्तमान में तालमेल कैसे बनायें?
जवाब : इसके लिए सेल्फ मोटिवेशन जरूरी है. सकारात्मक रूप से तय करें कि मैं क्या हूं? मैं क्या कर सकता हूं? और मैं क्या कर रहा हूं? हमारी तुलना अपने आप से होनी चाहिए न कि दूसरों से. इससे हम स्वयं को प्राेत्साहित करते हुए भविष्य के लिए सही प्लान कर सकते हैं. खुद को खुद से मोटिवेट करें.
सवाल : नौकरी में बेवजह असुरक्षित महसूस क्यों होता है?
जवाब : यह डर कहीं न कहीं लगभग सभी में होती है. इस डर को सकारात्मक तरीके से लेना चाहिए. वर्तमान में खुद को अपडेट रखें. इससे नौकरी में कुछ नया करने और नया सोचने की प्रवृत्ति बढ़ती है.
सवाल : मैं 25 वर्ष का युवा हूं. परिवार के साथ रहता हूं. फिर भी एक अकेलापन और उदासी बनी रहती है.
जवाब : यदि आप अपने परिवार के साथ खुशी वाले पल व्यतीत कर रहे हैं, तो उदासी नहीं रहेगी. लेकिन अगर आपके साथ एेसा ही लंबे समय तक होता है, तो आपको चाहिए कि अपना समय कुछ और चीजों में बितायें. सोशल वर्क करें. अपने शौक की चीजों में खुद को व्यस्त रखें. लाइफस्टाइल में बदलाव लायें. सबसे जरूरी है कि आप जल्द डॉक्टर से संपर्क करें.
सवाल : मैं नशे का अादि होता जा रहा हूं. नशा से दूर होने के लिए क्या करूं?
जवाब : पहले तो देखें कि आप किस तरह का नशा कर रहे हैं. शराब या अन्य नशीली पदार्थों का सेवन या एक ही साथ कई चीजों का सेवन करते हैं. आपको जागरूक होना होगा. भविष्य में आनेवाली परेशानियाें को लेकर सोचें. धीरे-धीरे इस नशा से दूर होने की सोचें. अपने आप से एक वादा कर लें कि अब कुछ भी हो नशा नहीं करेंगे. भावी जीवन की सोचें.
रिम्स में नहीं मनोरोगियों का वार्ड सामान्य मरीजों संग होता है इलाज
रांची : रिम्स में मनोराेगियों के लिए अलग से कोई वार्ड नहीं है. ऐसे में मनोरोगियों को सामान्य मरीजों के साथ रखना पड़ता है. मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) कई बार रिम्स प्रबंधन को मनोरोगियों के लिए अलग वार्ड बनाने का आदेश दे चुका है. साथ ही मान्यता रद्द करने की कड़ी चेतावनी भी दी है, लेकिन कोई ठोस पहल अब तक नहीं की गयी है.
रिम्स के पूर्व निदेशक डॉ बीएल शेरवाल द्वारा नेत्र विभाग के एक वार्ड में कुछ बेड का अलग वार्ड करने की पहल की थी, लेकिन मनोचिकित्सकाें द्वारा ऊपरी तल्ले पर वार्ड नहीं होने का आग्रह कर प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया था. इधर, रिम्स के मनोचिकित्सा विभाग ने प्रबंधन को दोबारा वार्ड बनाने का प्रस्ताव है. इसमें प्रबंधन को बताया गया है कि प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में मनोरोगियों के अलग वार्ड रहता है.
विभाग द्वारा वार्ड के लिए ग्राउंड फ्लोर में वार्ड बनाने का सुझाव दिया गया है. वार्ड के खिड़कियों में जाली लगाने के लिए कहा गया है, ताकि किसी प्रकार का हादसा नहीं हो. वहीं, वार्ड संचालित करने के लिए मैनपावर के कमी की जानकारी भी दी गयी है. निदेशक को बताया गया है कि मनोचिकित्सा विभाग में दो डॉक्टर ही, जिसको बढ़ाने की जरूरत है. प्रशिक्षित नर्स व वार्ड को नियुक्त करना होगा, जिससे ऐसे मरीजों को सही से रखा जायेगा.
सीआइपी, रिनपास में कार्यक्रम आज
रांची : सीअाइपी और रिनपास में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर समारोह का आयोजन होगा. सीआइपी में तीन दिनों तक कार्यक्रम चलेगा. यहां गुरुवार को बच्चों के बीच खेल और पेंटिंग प्रतियोगिता होगी.
वहीं ओपीडी में मरीजों को आत्महत्या के लक्षण और उससे बचने के बारे में बताया जायेगा. डॉ सुरजीत प्रसाद, डॉ प्रीति गुप्ता व डॉ दीपांजन की टीम यह जानकारी देगी. दीपाटोली कैंट में सेना के जवान और उनके परिजनों के बीच डॉ मधुमिता भट्टाचार्या और डॉ सुदीप सिन्हा का व्याख्यान होगा. 11 और 12 अक्तूबर को भी कई स्थानों पर कार्यक्रमों का आयोजन होगा. रिनपास में होनेवाली कार्यशाला में जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव अभिषेक कुमार, अधिवक्ता संजय कुमार शर्मा, मनोचिकित्सक डॉ सिद्धार्थ सिन्हा वक्ता के रूप में होंगे.
