शौर्य पुंज
रांची : शोले के जय-वीरु हों, थ्री इडियट्स के रैंचो, राजू या फरहान हों, गुंडे के बिक्रम और बाला हों या फिर गोलमाल सीरीज के गोपाल, माधव, लकी, लक्ष्मण. इन सबको एक ही चीज जोड़कर रखती है और वह इनके बीच की दोस्ती. असल जिंदगी में भी ऐसे कई दोस्तों की टोली मिल जायगी है.
हर वक्त एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है दोस्ती. कुछ ऐसा ही रिश्ता है बर्दमान कंपाउंड में रहने वाले देवांकुर चौधरी और रामानंद का. देवांकुर को भले ही सुनने और बोलने में परेशानी होती हो, लेकिन उनके पास रामानंद पातर जैसा दोस्त है. जो इनकी सारी बात समझते हैं. लोगों को देवांकुर से संवाद करने में मदद करते हैं. देवांकुर और रामानंद बचपन के साथी हैं. देवांकुर को लोगों को अपनी बात समझाने में जब भी जरुरत पड़ती है रामानंद उनका साथ देते हैं.
रामानंद बताते हैं कि बचपन में घर के पास के खेल के मैदान में दोनों खेला करते थे. धीरे-धीरे दोस्ती हुई. एक रोज रामानंद ने देवांकुर से बात करने कि कोशिश की, तो पता चला उन्हें सुनने और बोलने में परेशानी होती है.
रामानंद बताते हैं कि उनके मित्र देवांकुर फोटेग्राफर के अलावा एक अच्छे क्रिकेटर भी रह चुके हैं. जब वो चौके-छक्के जड़ते थे तो उनका कोई सानी नहीं रहता था. एलईबीबी हाई स्कूल से पढ़ाई करने के बाद देवांकुर कि दिलचस्पी फोटोग्राफी में जागी तो उन्होंने संत जेवियर्स कॉलेज से एनिमेशन का कोर्स किया. देवांकुर फोटोग्राफी को पेशे के रूप में अपना लिया है. बोलने में भले ही परेशानी होती हो पर उनकी तस्वीरें बोलतीं हैं. फिल्म गोलमाल में जिस तरह से लकी की बातों को समझने में लक्ष्मण मदद करते हैं ठीक उसी तरह रामानंद अपने मित्र देवांकुर की मदद करते हैं.
