गदही का दूध व इससे बना सौंदर्य प्रसाधन चलन में

संजयरांची : गदहा को ईमानदारी से चुपचाप काम करने के लिए जाना जाता है. यह अलग बात है कि कुछ समझदार इसे बेवकूफी का पर्याय भी मानते हैं. दूसरी ओर गदही के दूध तथा इससे बने सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल अब समझदारी की बात मानी जा रही है. खासकर महिलाओं के बीच. लालपुर की एस […]

संजय
रांची :
गदहा को ईमानदारी से चुपचाप काम करने के लिए जाना जाता है. यह अलग बात है कि कुछ समझदार इसे बेवकूफी का पर्याय भी मानते हैं. दूसरी ओर गदही के दूध तथा इससे बने सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल अब समझदारी की बात मानी जा रही है. खासकर महिलाओं के बीच.

लालपुर की एस बनर्जी और नामकुम की श्वेता अॉनलाइन मार्केटिंग नेटवर्क अमेजन से मंगाकर गदही के दूध से बने साबुन, शैंपू व क्रीम का इस्तेमाल कर रही हैं. ये सब त्वचा को साफ व मुलायम बनाने वाले तथा एंटी एजिंग व एंटी ऑक्सीडेंट उत्पाद हैं, जिनकी कीमत डेढ़ हजार से लेकर आठ हजार रुपये तक है.

बड़े शहरों में ज्यादा मांग
देश के बड़े शहरों में इनके कद्रदान बहुतेरे हैं. दरअसल गदही के दूध में विटामिन ए, बी1, बी2, बी6, डी, सी व इ सहित कैल्सियम, मैग्नेशियम, फॉस्फोरस, सोडियम, आयरन व जिंक भी पाये जाते हैं. विभिन्न वेबसाइट्स के अनुसार यह छोटे बच्चों के लिए मां के दूध का बेहतर विकल्प भी है.
खासकर उन बच्चों के लिए जिन्हें गाय के दूध से एलर्जी है तथा जो गैस की समस्या से पीड़ित होते हैं. गदही के दूध का स्वाद नारियल के दूध से मिलता-जुलता है. कोच्ची, पुणे व दिल्ली में 100एमएल दूध 700 रुपये में मिलता है. उधर अहमदाबाद में गदहों की संगत में तनाव और अकेलापन दूर करने का प्रयोग चल रहा है.
गदही के दूध का इतिहास
फ्रांस के राजा फ्रांकोस (प्रथम) के बारे कहा जाता है कि वह युद्ध की थकान गदही के दूध का इस्तेमाल कर मिटाते थे. मिश्र की सभ्यता में इस दूध के इस्तेमाल का वर्णन मिलता है. मिश्र की रानी क्लोपातरा गदही के दूध से नहाती थी. मुलायम, खूबसूरत व गोरी त्वचा के लिए दूध की जरूरत रानी के 700 गदही पूरी करते थे. एेसे कई तथ्य हैं. गदही का दूध बच्चों को पिलाने का चलन 20वीं सदी के प्रारंभ में शुरू हुआ.
गोड्डा में सबसे अधिक गदहे
18वीं पशुधन गणना के अनुसार राज्य के गोड्डा जिले में सबसे अधिक गदहे हैं. यहां इनकी संख्या 622 है. वहीं पूरे राज्य में सिर्फ 808 गदहे हैं. कई जिले ऐसे हैं, जहां कोई गदहा नहीं है. राजधानी रांची में सिर्फ 11 गदहे हैं. झारखंड में गधों की संख्या यदि बढ़ायी जाये, तो गदहा पालकों को भी इनसे अच्छी आय हो सकती है. आज की तारीख में सिर्फ गोड्डा जिले में ही इसकी मामूली संभावना दिखायी देती है. परेशानी गदही की दूध उत्पादक क्षमता कम होना भी है. एक गदही आधा लीटर से लेकर अधिकतम 1.3 लीटर ही प्रतिदिन दूध देती है. यही इसके महंगा होने का कारण भी है.
  • झारखंड की महिलाएं भी मंगा रहीं ऑनलाइन उत्पाद, दो से तीन हजार रुपये लीटर है दूध
  • छोटे बच्चों के लिए गदही का दूध बन रहा बेहतर विकल्प, कई प्रकार के विटामिन मौजूद
  • दूध से निर्मित सौंदर्य प्रसाधन भी हैं बेहद महंगे, झारखंड में गदहों की संख्या सिर्फ 808

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