रांची: गरीबों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने की योजना विफल हो रही है. सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए राज्य भर के जिला अस्पतालों में जन औषधि केंद्र खोले गये, लेकिन वहां डॉक्टर जेनेरिक की जगह ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं.
वहीं सिविल सजर्नों व चिकित्सकों सहित स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता से कई जिलों में भेजी गयी जेनेरिक दवाएं एक्सपायर हो रही हैं. दवाओं के सुपर स्टॉकिस्ट यूनिक फार्मा से मिली जानकारी के अनुसार धनबाद सदर व पीएमसीएच, दुमका, गिरिडीह, पलामू, पाकुड़, देवघर तथा सरायकेला-खरसांवा से दवाएं एक्सपायर होने के बाद वापस भेजी गयीं या वहीं पड़ी हुई हैं. सबसे खराब स्थिति जमशेदपुर जिले की है. यहां बने नये सदर अस्पताल व एमजीएम (मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) में जन औषधि केंद्र अब तक खुला ही नहीं है.
पूर्व स्वास्थ्य सचिव के विद्यासागर ने साल भर पहले ही जिले के सिविल सजर्न को चिट्ठी लिख कर इसका निर्देश दिया था. दरअसल जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल व लाभ के लिए सरकार कोई प्रचार-प्रसार नहीं कर रही. इससे आम लोगों में जागरूकता की कमी है. वहीं सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक इसमें रुचि नहीं ले रहे. इन कारणों से गरीब मरीज महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं.
तुलनात्मक रूप से कुछ जिले बेहतर
जेनेरिक दवाओं की बिक्री के मामले में कुछ जिलों का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से बेहतर है. रिम्स व सदर अस्पताल रांची, गुमला, सिमडेगा, चतरा, लोहरदगा, साहेबगंज व चाईबासा में जन औषधि केंद्र काम कर रहा है. इन्हीं जिलों से अभी प्रति माह दो से ढाई लाख रुपये की दवाओं का कारोबार हो रहा है, जबकि केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन के सूत्रों के मुताबिक झारखंड में हर माह 90 करोड़ की दवाओं का कारोबार होता है.
दवाओं की संख्या बढ़ी
जन औषधि केंद्रों में जेनेरिक दवाओं की संख्या बढ़ रही है. यहां लगभग तीन सौ तरह की दवाएं रखी जानी हैं. शुरुआत में सिर्फ 25 किस्म की दवाएं यहां मिलती थीं. बाद में 54 और दवाएं जोड़ी गयीं. यूनिक फार्मा के अनुसार 42 और दवाएं झारखंड पहुंचने वाली हैं. सरकारी क्षेत्र का ब्यूरो ऑफ फार्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग इंडिया ये दवाएं उपलब्ध करा रहा है.
