रांची : शिशु स्वास्थ्य कोषांग के प्रभारी डाॅ अजित ने कहा कि जन्म के बाद के 28 दिन नवजात के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, क्याेंकि इसी समय में शिशु की मृत्यु की संभावना सबसे अधिक रहती है. अगर इस समय में नवजात बीमार पड़ता है, तो उसका सही इलाज होना चाहिए.
राज्य में शिशु मृत्यु का आंकड़ा 1000 बच्चों में 29 है. वह मंगलवार को बीएनआर में नवजात शिशु सप्ताह पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला मेेें राज्य की स्थिति की जानकारी दे रहे थे. उन्हाेंने कहा कि जन्मजात शिशु मृत्यु दर में राष्ट्रीय आंकड़ा 1000 बच्चों में 21 है. अभियान निदेशक एके झा ने कहा कि 21 नवंबर तक चलाये जा रहे नवजात शिशु सप्ताह के तहत यह जिम्मेदारी दी गयी है कि बीमार व अति जोखिम वाले बच्चों को सही जगह पर इलाज सुनिश्चित कराया जाये. इसके लिए सहिया व एएनएम की भूमिका महत्वपूर्ण है.
सहिया क्षेत्र के शून्य से पांच वर्ष के बच्चों की सूची तैयार करें कि कितने लोगों को लाभ मिला है. कार्यक्रम में नवजात शिशु सप्ताह के प्रचार-प्रसार के लिए नवजात बुक का विमोचन किया गया. सहिया व नवजात बच्चों की माताओं ने अनुभव बताये. डॉ पुष्पा मारिया बेक, डॉ वाष्की सहित यूनिसेफ,जपाइगाे व राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कर्मचारी मौजूद थे.
जन्म के एक माह मेें ही होती है 18,400 बच्चों की मौत
अभियान निदेशक एके झा ने बताया कि झारखंड में प्रत्येक साल आठ लाख बच्चे जन्म लेते हैं. इनमें से 18,400 नवजात की मृत्यु पहले महीने में हो जाती है. मृत्यु के शिकार बच्चों में समय से पहले जन्म लेनेवाले बच्चों की संख्या 35 फीसदी होती है. वहीं, सांस की समस्या वाले बच्चों की संख्या 20 फीसदी होती है.
निमोनिया से 16 फीसदी, डायरिया से दो फीसदी, जन्मजात विकृत से नौ फीसदी व अन्य कारण से होनेवाली मौत का कारण तीन फीसदी होता है. यूनिसेफ की मधुलिका जोनाथन ने कहा कि नवजात शिशु को जीवन देने के लिए मातृ स्वास्थ्य व शिशु स्वास्थ्य दोनों पर ध्यान देने की जरूरत है. परिवार नियोजन पर भी जोर देने की जरूरत है, जिससे स्वस्थ बच्चे का जन्म हो सकता है.
