रांची : मनुष्य में चंचलता की स्थिति आ गयी है : सहस्त्रबुद्धे

रांची : राज्यसभा सदस्य व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि व्यवस्था को समझने के पहले यह जरूरी है कि अवस्था को समझें. जब तक अवस्था को नहीं समझेंगे, तब तक उसके अंदर निहित पैटर्न समझ नहीं सकेंगे. इसलिए अवस्था को समझ लेना,उसका आकलन बनाना, व्यवस्था अवलोकन की प्री कंडीशन है. उन्होंने […]

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रांची : राज्यसभा सदस्य व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि व्यवस्था को समझने के पहले यह जरूरी है कि अवस्था को समझें. जब तक अवस्था को नहीं समझेंगे, तब तक उसके अंदर निहित पैटर्न समझ नहीं सकेंगे. इसलिए अवस्था को समझ लेना,उसका आकलन बनाना, व्यवस्था अवलोकन की प्री कंडीशन है.
उन्होंने कहा कि हमें अवलोकन के पहले आकलन करना चाहिए और व्यवस्था के पहले अवस्था का ध्यान रखना जरूरी है. इसके बारे में जब तक हमारी धारणा सही व स्पष्ट नहीं होगी, तब तक व्यवस्था, अवलोकन व व्यवस्था के बाद उसमें परिवर्तन थोड़ी कठिन होगी. उन्होंने कहा कि आज रुक कर चीजों को देखना दुष्कर हो गया है. लोग एक चीज देख ही नहीं रहे हैं,बल्कि एक साथ कई चीजों को देख रहे हैं. ऐसा इसलिए है कि समाज की गति है. 20 साल में इसमें काफी बदलाव हुआ है. मनुष्य में चंचलता की स्थिति आ गयी है.
समाज की शक्ति से चल रही है व्यवस्था: मध्य प्रदेश सरकार में कल्चर व टैक्स विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि समाज में बहुत शक्ति है. इसकी शक्ति से ही व्यवस्था चल रही है.
उन्होंने कहा कि भारत की आबादी 132 करोड़ है, जबकि थाने 15268 हैं. अगर यूएसए का आंकड़ा देखें तो वहां की आबादी मात्र 32 करोड़ है. वहां थाने 17985 हैं. इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में अमेरिका की तुलना में कितने कम थाने हैं, फिर भी यहां समाज निरंतर प्रवाह में है. लोकसत्ता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष जय प्रकाश नारायण और राज्यसभा सदस्य संपतिया उड़के ने भी विचार रखे.
रांची : भावनामय अर्थव्यवस्था के कारण भारत ने नहीं खोयी विरासत : तुलसी तावरे
रांची : लोकमंथन में शनिवार को तीसरे सत्र में अर्थावलोकन पर चर्चा हुई. इसमें तुलसी तावरे ने कहा कि भारतीय दृष्टि में धन के दो स्वरूप हैं. पहला भौतिक व दूसरा भावनामय अर्थ व्यवस्था. भावनामय अर्थव्यवस्था के कारण ही भारत ने अपनी विरासत को नहीं खोया है.
वहीं दूसरी तरफ विश्व में कई बैंक दिवालिया हो गये. हालांकि स्वतंत्रता के बाद आत्मविश्वास खंडित हुआ. यही वजह है कि भारतीय दृष्टि को जो स्थान मिलना चाहिए था, नहीं मिल पाया. अब हमें इसे बरकरार रखने के लिए नेतृत्व में नैतिकता को प्राथमिकता देनी होगी. अर्थव्यवस्था का समुचित विकेंद्रीकरण करना होगा. देश में ही अच्छी तकनीक को विकसित करना होगा, ताकि मुद्रा की मर्यादा का क्षरण नहीं हो पाये.
अर्थावलोकन पर चर्चा करते हुए प्रो पी कनगसभापथी ने कहा कि धन संतुष्टि प्रदान करता है. यह आनेवाली पीढ़ी के बेहतरी के लिए जरूरी है. भारत ने अर्थ को कभी नकारा नहीं लेकिन उसे जीवन का एकमेव उद्देश्य भी नहीं माना. धन का नियंत्रण विश्व मंगल और अनियंत्रित बहना विश्व विनाश का कारण बन सकता है. अर्थ साधन के बल पर भारत मानवीय मूल्यों की सबसे बड़ी पूंजी वाला देश है. कार्यक्रम का संचालन हितेश शंकर ने किया.
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