गिद्दी से अजय कुमार की रिपोर्ट
Success Story: झारखंड के रामगढ़ जिले के मांडू प्रखंड स्थित जोबला गांव की आदिवासी महिलाओं ने सामूहिक प्रयास, आधुनिक सोच और जैविक खेती के माध्यम से आत्मनिर्भरता की एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है. कभी केवल खेती तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज जैविक अरहर की खेती से लेकर उसकी प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और बाजार तक बिक्री का पूरा काम खुद संभाल रही हैं. इस पहल ने न केवल उनकी आय बढ़ाई है, बल्कि गांव की कई महिलाओं को सम्मानजनक रोजगार और नई पहचान भी दिलाई है.
15 महिलाओं ने शुरू किया आत्मनिर्भरता का सफर
जोबला गांव की मुस्कान महिला विकास सपोर्ट संघ से जुड़ी 15 आदिवासी महिलाओं ने सामूहिक रूप से इस पहल की शुरुआत की. उन्हें सपोर्ट संस्था ने प्रशिक्षण देकर आधुनिक तरीके से जैविक खेती और दाल प्रसंस्करण की जानकारी दी. वर्ष 2016 में महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के तहत गांव में दाल मिल प्रसंस्करण इकाई स्थापित की गई. इसके बाद महिलाओं ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. महिला संघ को झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) की ओर से दाल मिल उपलब्ध कराई गई, जिससे वे अरहर की सफाई, छिलाई और प्रोसेसिंग कर उच्च गुणवत्ता वाली दाल तैयार करने लगीं.
हर साल छह टन जैविक दाल का उत्पादन
महिला समूह हर वर्ष करीब छह टन जैविक अरहर दाल तैयार कर बाजार में भेज रहा है. तैयार दाल को 'सुरूचि नेचुरल' ब्रांड के नाम से आकर्षक पैकेजिंग में बेचा जाता है. इसकी कीमत लगभग 130 रुपये प्रति किलोग्राम रखी गई है. रामगढ़, रांची, हजारीबाग समेत कई शहरों में इस दाल की नियमित आपूर्ति की जाती है. बिना पॉलिश, रसायन मुक्त और जैविक होने के कारण उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. बढ़ती मांग के चलते महिलाओं की आय में भी लगातार वृद्धि हो रही है.
जैविक खेती से गुणवत्ता बनी पहचान
जोबला गांव की महिलाएं पूरी तरह जैविक पद्धति से अरहर की खेती करती हैं. खेती के दौरान किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता. यही कारण है कि दाल की गुणवत्ता, स्वाद और पोषण बरकरार रहता है. जब स्थानीय उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं होता, तब महिला समूह लातेहार सहित अन्य जिलों से अरहर खरीदकर उसकी प्रोसेसिंग करता है, ताकि बाजार में आपूर्ति प्रभावित न हो.
सोलर सिस्टम खराब होने से बढ़ी परेशानी
दाल मिल के संचालन के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की ओर से सोलर आधारित बैटरी और इनवर्टर उपलब्ध कराया गया था. इससे बिजली पर निर्भरता कम हो गई थी, लेकिन पिछले एक-दो वर्षों से यह सोलर सिस्टम खराब पड़ा है. वर्तमान में दाल मिल का संचालन सामान्य बिजली से किया जा रहा है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है. महिला समूह का कहना है कि यदि सोलर प्रणाली फिर से चालू हो जाए, तो उत्पादन क्षमता और लाभ दोनों में बढ़ोतरी होगी.
सरकार से सहयोग की उम्मीद
महिला संघ की सचिव संगीता कुमारी ने बताया कि जैविक अरहर दाल की बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है. यदि सरकार तकनीकी सहायता, सोलर सिस्टम की मरम्मत और विपणन में सहयोग करे, तो उत्पादन कई गुना बढ़ाया जा सकता है. इससे और अधिक महिलाओं को रोजगार मिलेगा. संघ की अध्यक्ष रीता सोरेन ने कहा कि समूह की सभी महिलाएं पूरी मेहनत और समर्पण के साथ जैविक खेती और दाल प्रसंस्करण का कार्य कर रही हैं. इस पहल से महिलाओं की आय बढ़ी है और उनके परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं.
दूसरे गांवों के लिए बना मॉडल
सपोर्ट संस्था के सचिव भवानी शंकर गुप्ता ने कहा कि स्वयं सहायता समूहों को स्वरोजगार से जोड़कर आर्थिक रूप से सशक्त बनाना संस्था का प्रमुख उद्देश्य है. जोबला महिला संघ इसका सफल उदाहरण बन चुका है. यदि सरकार विपणन, तकनीकी सहायता और आधारभूत सुविधाओं का विस्तार करे, तो इस मॉडल को झारखंड के अन्य गांवों में भी लागू किया जा सकता है.
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इन महिलाओं ने बदली गांव की तस्वीर
मुस्कान महिला विकास सपोर्ट संघ से रीता सोरेन, संगीता कुमारी, आशा देवी, द्रौपदी देवी, तालो देवी, सातमुनी देवी, दिनेश्वरी देवी, फुलमनी देवी, बसंती देवी, वीणा देवी, संगीता देवी, हीरामुनी देवी, रूपुमुनी देवी, मीना टुडू और रूपुमुनी सहित 15 महिलाएं जुड़ी हैं. इन सभी ने मिलकर यह साबित कर दिया है कि यदि महिलाओं को सही प्रशिक्षण, संसाधन और अवसर मिले, तो वे केवल अपने परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे गांव की अर्थव्यवस्था बदल सकती हैं. जोबला की यह कहानी आज झारखंड में महिला सशक्तिकरण, जैविक खेती और ग्रामीण उद्यमिता की प्रेरक मिसाल बन चुकी है.
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