रामगढ़. छावनी फुटबॉल मैदान में ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित प्रवचन के 19वें दिन डॉ स्वामी युगल शरण ने बताया कि जो भक्ति गुरु कृपा से मिलती है, वह सिद्ध भक्ति अथवा निष्काम भक्ति है. इसको अनपायिनी भक्ति, निर्भरा भक्ति, विशुद्धा भक्ति भी कहते हैं. इसके अधीन भगवान रहते हैं. यह साधना भक्ति करने से मिलती है. इसका अर्थ मन को भगवान में लगाना है. यही साधन भक्ति की परिपक्वता का नाम होता है भाव भक्ति. भाव भक्ति में मन लगने लगता है. भाव भक्ति परिपक्व हो जाने से मन लग जाता है. शांत भाव सबसे नीचा व माधुर्य भाव सर्वोच्च है. शांत भाव का उपासक दास्य भाव में नहीं हो सकता है. साधना और सेवा के लिए श्रद्धा जरूरी है. श्रद्धा नहीं होने पर भी ये नहीं सोचना है कि जब श्रद्धा होगा, तब गुरु की शरण में जाकर साधना करूंगा. ये गलत बात है. श्रद्धा नहीं होने पर भी जब नियमित रूप से गुरु के शरण में सत्संग करेंगे, तो श्रद्धा अपने आप आ जायेगी. प्रवचन 21 दिन तक चलेगा.
गुरु कृपा से सिद्ध भक्ति मिलती है : स्वामी युगल शरण
गुरु कृपा से सिद्ध भक्ति मिलती है : स्वामी युगल शरण
