पतरातू (रामगढ़). झारखंड के प्रमुख पर्यटन केंद्र पतरातू लेक रिजॉर्ट की पहचान और रामगढ़ जिले की बड़ी आबादी की पेयजल जरूरतों से जुड़े पतरातू डैम की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है.
एक सप्ताह पहले, भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (एनडीएसए) की पांच सदस्यीय टीम ने पतरातू डैम का निरीक्षण किया था. इस निरीक्षण के दौरान बांध की सुरक्षा व रखरखाव से जुड़े कई बिंदुओं पर चिंता जताई है. इनमें पानी बाहर निकालने के रास्ते (स्पिल वे) की दरार, बांध पर उगे बड़े-बड़े पेड़ व जल निकासी के इलेक्ट्रिकल गेट ऑपरेशन का ठप होना प्रमुख हैं.
पतरातू डैम का निर्माण पतरातू थर्मल पावर स्टेशन (पीटीपीएस) की स्थापना के साथ 60 के दशक में शुरू हुआ था. वर्ष 1971 में बनकर तैयार हुए इस जलाशय का उद्देश्य तत्कालीन पावर प्लांट की जरूरतों के साथ पीटीपीएस कालोनी, सीसीएल की विभिन्न परियोजनाओं समेत रामगढ़ कैंटोनमेंट क्षेत्र में जलापूर्ति करना था. आज यही डैम पतरातू लेक रिजॉर्ट के माध्यम से पर्यटन और राजस्व की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. ऐसे में अगर बांध की सुरक्षा में लापरवाही बरती गई, तो न केवल पतरातू लेक रिजॉर्ट को खतरा होगा, बल्कि रामगढ़ जिले की लाखों लोगों की पेयजल आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे एक गंभीर मानवीय संकट उत्पन्न हो सकता है.
2727 एकड़ में फैला है पतरातू डैम
पतरातू डैम लगभग 2727 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है. इसका निर्माण बिहार के पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (पीएचईडी) द्वारा कराया गया था. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, डैम का डिजाइन ओपी डालमिया ने तैयार किया था. जलाशय में पानी का मुख्य स्रोत रांची के पिठोरिया क्षेत्र से आने वाली नलकारी नदी व ओरमांझी क्षेत्र की ओर से आने वाली सिमरा नदी है. निर्माण के समय डैम की अधिकतम जल भंडारण क्षमता 1332.05 आरएल (जलस्तर का निशान) निर्धारित थी. बताया जाता है कि जलाशय की उम्र लगभग छह दशक से अधिक होने के कारण इसकी जल भंडारण क्षमता को घटाकर 1327.05 आरएल कर दिया गया. लंबे समय से जलाशय में गाद जमने और रखरखाव की स्थिति को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं.
आठ फाटकों से नियंत्रित होती है जल निकासी
पतरातू डैम में जलस्तर को नियंत्रित करने के लिए आठ फाटक बनाए गए हैं. जरूरत के अनुसार इन फाटकों को खोलकर जल निकासी की जाती है. फाटकों के संचालन के लिए मैन्युअल और इलेक्ट्रिकल दोनों व्यवस्थाएं उपलब्ध थीं, लेकिन रखरखाव के अभाव में इलेक्ट्रिकल गेट ऑपरेशन पूरी तरह ठप बताया जा रहा है. ऐसी स्थिति में अचानक बाढ़, अत्यधिक जलस्तर या किसी आपात स्थिति के दौरान फाटकों का संचालन चुनौतीपूर्ण हो सकता है. डैम की सुरक्षा के लिए जल निकासी की व्यवस्था का सुचारु रहना बेहद जरूरी है.
बांध पर उगे बड़े पेड़ और दरारें चिंता का कारण
पतरातू डैम का बांध मिट्टी से निर्मित है और इसकी लंबाई लगभग तीन किलोमीटर बताई जाती है. बांध की नियमित साफ-सफाई पहले प्रत्येक वर्ष कराई जाती थी. वर्ष 2017 में पर्यटन विकास के उद्देश्य से बांध को झारखंड टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को हस्तांतरित किया गया था. इसके बाद बांध पर पैदल पथ और पर्यटकों के बैठने के लिए कंक्रीट बेंच का निर्माण भी कराया गया. हालांकि, वर्तमान में बांध की साफ-सफाई और रखरखाव की स्थिति दयनीय बताई जा रही है. बांध पर घनी झाड़ियां व बड़े-बड़े पेड़ उग आए हैं. स्पिल वे में दरार की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है. मिट्टी से बने बांध पर पेड़ों की जड़ें और संरचनात्मक क्षति बांध की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं. एनडीएसए की टीम ने निरीक्षण के दौरान इन बिंदुओं को लेकर गहरी चिंता जताई है.
छह दशक पुराने डैम के रखरखाव पर सवाल
पतरातू डैम का निर्माण वर्ष 1960 के दशक में लगभग 5.5 करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुआ था. करीब एक दशक में यह बनकर तैयार हुआ. डैम की स्थापना का मुख्य उद्देश्य पीटीपीएस को जल उपलब्ध कराना और आसपास के क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना था. समय बीतने के साथ डैम की संरचना, जल भंडारण क्षमता, फाटकों समेत अन्य तकनीकी व्यवस्थाओं के रखरखाव की जरूरत बढ़ गई है. लेकिन लंबे समय से उचित रखरखाव नहीं होने के कारण डैम की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. पर्यटन के लिहाज से पतरातू लेक रिजॉर्ट भी इसी जलाशय पर निर्भर है.
डैम सुरक्षा अधिनियम 2021 के पालन की मांग
देशभर के बांधों की सुरक्षा और निगरानी के लिए केंद्र सरकार द्वारा डैम सुरक्षा अधिनियम 2021 लागू किया गया है. इस अधिनियम के तहत बांधों की सुरक्षा, नियमित निरीक्षण और आवश्यक तकनीकी व्यवस्था पर जोर दिया गया है. पतरातू डैम में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. डैम की निगरानी और रखरखाव के लिए अनुभवी अभियंताओं की नियुक्ति, तकनीकी जांच व आपातकालीन संचालन व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है. स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि डैम की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सभी जरूरी कदम तत्काल उठाए जाएं.
जल संसाधन विभाग को हस्तांतरण की कवायद तेज
पतरातू डैम पूर्व में बिहार राज्य विद्युत बोर्ड की परिसंपत्ति हुआ करता था. झारखंड अलग राज्य बनने के बाद इसका स्वामित्व झारखंड बिजली बोर्ड के पास चला गया. परिसंपत्ति के स्वामित्व और विभागीय जिम्मेदारी को लेकर लंबे समय से स्थिति स्पष्ट नहीं होने के कारण रखरखाव प्रभावित होने की बात सामने आती रही है. इस वजह से झारखंड ऊर्जा उत्पादन निगम या झारखंड बिजली बोर्ड के अधिकारी रखरखाव के लिए जिम्मेदार होने से कतरा रहे थे. हाल के दिनों में झारखंड जल संसाधन विभाग के जल भवन, डोरंडा में एनडीएसए के नेतृत्व में बैठक आयोजित की गई थी. बैठक में स्टेट डैम सेफ्टी अथॉरिटी झारखंड और झारखंड ऊर्जा उत्पादन निगम के महाप्रबंधक (सिविल) की मौजूदगी में डैम से संबंधित दस्तावेजों की मांग पीटीपीएस शेष परिसंपत्ति के प्रशासक एसके पांडा से की गई है. बताया जा रहा है कि दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पतरातू डैम को जल संसाधन विभाग को हस्तांतरित करने की दिशा में आगे की कार्रवाई की जा सकती है. इससे डैम के रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेदारी स्पष्ट होने की उम्मीद है.
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समय रहते नहीं हुआ सुधार तो बढ़ सकता है खतरा
पतरातू डैम केवल जलाशय नहीं, बल्कि क्षेत्र की पेयजल व्यवस्था, बिजली उत्पादन और पर्यटन की महत्वपूर्ण कड़ी है. बांध की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर एनडीएसए की चिंता के बाद अब संबंधित विभागों के सामने बड़ी जिम्मेदारी है. स्पिल वे की दरार की मरम्मत, बांध से पेड़ों और झाड़ियों की सफाई, फाटकों की इलेक्ट्रिकल व्यवस्था को दुरुस्त करना और नियमित तकनीकी निरीक्षण जैसे कार्यों को प्राथमिकता देने की जरूरत है. विशेषज्ञों का मानना है कि डैम के रखरखाव में अब और देरी नहीं होनी चाहिए. समय रहते ठोस कदम उठाए गए तो पतरातू डैम की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ पर्यटन और पेयजल व्यवस्था को भी सुरक्षित रखा जा सकेगा.
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