बाबा शिबू सोरेन संथाली समाज को जागरूक करने वालों का हौसला बढ़ाते, नौकरी देने वाला बनने की नसीहत देते
रामगढ़. दिशोम गुरू शिबू सोरेन के अंतिम संस्कार में मांझी परगना महल घाड़ दिशोम, संथाली समाज सुधारक, संथाली फिल्म के कलाकार और परिवार से जुड़े अधिकांश लोगों की उपस्थित दिखा. शिबू सोरेन के पैत्रिक आवास के बालकोनी में लगे कुर्सियों पर समाज सुधारक लोग विरजमान हुए. सुरेंद्र टुडू लुगू बोरू का गोडेथ (अगुवा) ने बताया कि बाबा शिबू सोरेन के दाह संस्कार में सभी रीति-रिवाज का पालन हो, यह हम देखने आये हैं. गांव के पाहन, उप पाहन, सभी रश्मों को अदा करेंगे. कोई रश्म छुट ना जाये. इसके लिए हम पूरे विधि-विधान कार्यक्रम में उपस्थित रहेंगे. बिंदे सोरेन ने बताया कि जमशेदपूर से नेमरा गांव आये हैं. संथाल समाज के लिए बाबा के संदेश को आगे प्रचारित करते रहेंगे. दशरथ हंसदा (संथाली फिल्म के कलाकार) ने बताया कि अभी तक 41 फिल्म बनायें हैं. दो संथाली फिल्म सगुन एना सोहाग दुलाड़ और सिता नाला रे सगुन सुपाड़ी, दोनों फिल्म जब रिलीज किया जा रहा था, इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बाबा शिबू सोरेन थे. उन्होंने ने कहा था कि संथाली फिल्म बनाने का लाईन पकड़े हो, छोड़ना नहीं. संथाली रीति रिवाज को जागरूक करते रहो. संथाली समाज के लोग कलां, नृत्य, ड्रामा में रूचि रखते हैं. फिल्म के माध्यम से संस्कृति को बढ़ाते रहना. बाबा इस बात पर भी जोर देते थे कि पढ़-लिखकर लोग आते हैं और नौकरी मांगते हैं. उनका कहना था कि डॉक्टर बनकर आये तो हॉस्पीटल अपना बनाओ, इंजीनियर बनकर आये हो तो फैक्ट्री लगाओ, मालिक बनो. समाज सुधारको के साथ शिबू सोरेन के समधी शशिभुषण टूपकाडीह जैनामोड़ से आये थे. उनहोंने बताया कि रांची हिल व्यु हॉस्पीटल में अंतिम बार शिबू सोरेन से मिले थे. उसके बाद वे ईलाज के लिए दिल्ली चले गये. पिछले कई वर्षो में जब आपस में मिलते थे तो परिवार के साथ-साथ झारखंड की राजनीति पर ही उनसे अधिक बात होती थी.
बचपन के दोस्त काशीनाथ बेदिया दाह संस्कार स्थल पर बैठे रहे
शिबू सोरेन के बचपन के दोस्त काशीनाथ बेदिया मंगलवार सुबह नौ बजे ही नेमरा गांव पहुंच गये थे. ठेकानाला दाह संस्कार स्थल पर सुबह से ही जाकर बैठे हुए थे, आंखे नम थी. कभी खड़ा तो घंटों जमीन पर बैठ जाते. दोपहर 12 बजे के बरीब बातचीत में बताया कि बरलंगा स्कूल में शिबू सोरेन के साथ पढ़ाई करते थे. इसके बाद बरलंगा से गोला स्कूल में पढ़ाई के लिए शिबू सोरेन चले गये. उनके बड़े भाई राजाराम मैट्रीक टेस्ट परीक्षा में बेहतर अंक लाये थे. पिता सोबरन मांझी इस खुशी में उनके लिए नास्ता लेकर जा रहे थे. उस समय टाटा-बरकाकाना ट्रेन चला करता था. जिससे शिबू सोरेन के पिता गोला स्कूल आ रहे थे. जब उनकी हत्या हो गयी तो कुछ दिनों के लिए छात्रावास में रहना छोड़ दिये. एक ही कमरा में वर्षो साथ रहने की पुरानी बाते अभी खुब याद आ रही है. यह बाेलकर रोने लगे.
वहीं ताराचंद्र मंडल 80 वर्ष उपर बरगा गांव ने बताया कि शिबू सोरेन जब भी नेमरा में रहते. हमारे घर के बाहर आकर बैठते थे. मुखिया के चुनाव में हम दोनों गांव में घुमकर वोट मांगे थे. लेकिन शुरू से दारू, हड़िया का सख्त विरोधी थे. महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने के लिए झारखंड में घुमने लगे. तब से कम मुलाकात होती थी. लेकिन हमेशा गांव के पुराने लोगों से हाल-चाल लेते थे.
रंगकर्मी मुन्ना लोहरा भी थे मर्माहत
हेमंत सोरेन के हमशक्ल रंगकर्मी मुन्ना लोहरा रांची से नेमरा गांव पहुंचे थे. उन्होंने बताया कि एक फिल्म में काम करने के दौरान दाढ़ी व बाल बढ़ाया था. वेशभूषा में बदलाव के बाद पहली बार गुमला किसी कार्यक्रम में शामिल हुआ. मेरा गेटप देखकर गांव के लोग आकर्षित व प्रभावित हुए. इसके बाद से मैं दाढ़ी व बाल को और सजा-संवारकर रखने लगा. गांव-गांव में लोग हेमंत सोरेन के हमशक्ल के रूप में जानने लगे. मुन्ना लोहरा ने बताया कि शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन से इतना प्रभावित हैं कि हर दिन दोनों के संदेशो व आदर्शो का पालन करते हैं. आज काफी दु:खी हैं.
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