खामियाजा उठाना पड़ रहा है डंपर ओनर तथा कोयला ट्रांसपोर्टरों को
कुजू : सारूबेड़ा परियोजना की महत्वाकांक्षी परियोजना फीडर ब्रेकर अपने स्थापना काल से ही विवादों में है़ एक तो यहां पर दो गुटों के वर्चस्व की लड़ाई स्थापना के समय से चल रही है़ वहीं दूसरी ओर फीडर ब्रेकर कभी भी अपने कोयला क्रश करने के लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच पाया है़ इसका खामियाजा यहां के ट्रांसपोर्टरों व डंपर ओनरों को उठाना पड़ रहा है़
आर्थिक समस्या उत्पन्न होने के कारण क्षेत्र के कई ओनर के डंपर अब तक बिक चुके है़ं जबकि कई डंपर ओनर अपने डंपरों को यहां से दूसरे स्थान पर ले गये हैं. कोयला ट्रांसपोर्टर भी अपने निर्धारित मासिक लक्ष्य को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. बताया जाता है कि केंद्र सरकार द्वारा नियम बनाया गया है कि पावर प्लांट में 100 एमएम के साइज के कोयले को ही भेजा जाना है़ इसके तहत सीसीएल द्वारा फीडर ब्रेकर में कोयला क्रश करने के लिए टेंडर निकाला गया़ इसमें बीपीपीएल यूसीसी जेवी कंपनी द्वारा टेंडर लिया गया़
उक्त कंपनी द्वारा एक दिन में 20 हजार टन तथा महीने में छह लाख टन कोयला क्रश करने का लक्ष्य मिला. परंतु उक्त कंपनी कभी भी अपने लक्ष्य के आसपास नहीं पहुंच पायी. कंपनी द्वारा एक माह में करीब एक लाख टन कोयला क्रश किया गया है़ जो अपने निर्धारित लक्ष्य से काफी पीछे है़
डंपरों के जाम से होती है परेशानी
फीडर ब्रेकर में कोयला क्रश करने के लिए आउटसोर्सिंग कंपनी द्वारा अब तक तीन मशीनें लगायी गयी हैं. परंतु मशीन हमेशा ब्रेक डाउन होते रहता है़ इसके कारण प्राय: एक या दो मशीन ही कार्यरत रहता है़
वहीं शिफ्ट चेंज करने या अन्य दूसरे कारणों से फीडर ब्रेकर के पास कोयला गिराने आये डंपरों का जाम लगा रहता है़ डंपर चालकों का कहना है कि वे लोग कभी-कभी छह से सात घंटे तक जाम में फंसे रहते हैं. इसके कारण दिन भर में वे लोग दो से तीन ट्रिप ही कर पाते हैं. इससे डंपर ओनरों के समक्ष आर्थिक समस्या उत्पन्न होने लगी है़
