दुलमी : मेहनत व लगन से कोई काम किया जाये, तो वह आसान हो जाता है. इस कथन को दुलमी प्रखंड के कुल्ही पंचायत अंतर्गत कोरियाटांड़ निवासी जयप्रकाश भोगता ने बंजर भूमि पर फूलों की खेती कर दिखाया है. उन्होंने बंजर भूमि पर फूलों की खेती कर अपनी कामयाबी की कहानी लिख रहे है. गेंदा […]
By Prabhat Khabar Digital Desk | Updated at :
दुलमी : मेहनत व लगन से कोई काम किया जाये, तो वह आसान हो जाता है. इस कथन को दुलमी प्रखंड के कुल्ही पंचायत अंतर्गत कोरियाटांड़ निवासी जयप्रकाश भोगता ने बंजर भूमि पर फूलों की खेती कर दिखाया है. उन्होंने बंजर भूमि पर फूलों की खेती कर अपनी कामयाबी की कहानी लिख रहे है. गेंदा के फूल को देख कर रास्ते से गुजरने वाले हर व्यक्ति का मन गदगद हो उठता है.
बड़े भू-भाग में लहलहाते गेंदा देखने लायक है. यहां की मनमोहक, आकर्षक व मनोरम नजारा देखते ही बना है. फूल की खुशबू से पूरा क्षेत्र सुगंधित हो रहा है. इधर से गुजरने वाले राहगीर सोचने को मजबूर होते है कि क्या फूल की खेती से अच्छी कमाई की जा सकती है. लेकिन जयप्रकाश ने फूलों की खेती कर आय अर्जित कर रहे है. वहीं आधा दर्जन महिला व पुरुष को रोजगार भी दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि फूलों के बीच रह कर फूल की खेती करना काफी आनंद मय लगता है.
विवेकानंद से मिली प्रेरणा: किसान जयप्रकाश ने बताया कि वे बेरोजगार बैठे हुए थे. इनकी दो एकड़ बंजर भूमि बेकार पड़ा हुई थी. वे सोचते थे कि इस भूमि पर क्या किया जाये. उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को आगे बढ़ने के लिए काफी प्रेरणा दी है. उन्हीं के बताये मार्ग पर चल कर वे इस भूमि पर परिश्रम करना शुरू किया.
साथ ही गड्ढे के पानी को रोक कर यहां के भूमि को आबाद करना शुरू किया. जिस पर उन्होंने कृषि कार्य से अलग हट कर फूलों की खेती करना शुरू किया. वे यहां पर गेंदा, गुलाब व रात रानी फूलों की खेती कर रहे है. आज जयप्रकाश आसपास के किसानों व युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए है.
रांची से कोलकाता तक जाता है इनका फूल: कोरियाटांड़ का फूल दुलमी, चितरपुर के अलावा रामगढ़, रांची, कोलकाता समेत कई शहरों में बिक्री के लिए जाता है. प्रतिदिन फूलों की मांग है. खासकर शादी समारोह के अलावा पूजा, महोत्सव में फूलों की अधिक खपत होती है. कई जगह के व्यवसायी यहां आकर फूल ले जाते है. उनका कहना है कि फूल की खेती से प्रतिमाह लगभग 50 से 60 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है. इससे अपने परिजनों का जीविकोपार्जन कर रहे है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 से यह खेती शुरू की थी.