गैस पर निर्भर हो चुके पलामू के लोग कोयला और गोइठा के चूल्हा जलाने पर हुए विवश.

गैस पर निर्भर हो चुके पलामू के लोग कोयला और गोइठा के चूल्हा जलाने पर हुए विवश.

प्रभात खबर टीम : मेदिनीनगर

गैस की बढ़ती कीमतों और किल्लत के कारण ग्रामीण व अर्ध-शहरी इलाकों में एक बार फिर पुराने दिनों की वापसी हो रही है. रसोई गैस की किल्लत व कई क्षेत्रों में समय पर सिलिंडर न मिल पाने के कारण मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग अब कोयला और गोइठा (उपले) का रुख कर रहे हैं. जो परिवार पूरी तरह गैस पर निर्भर हो चुके थे, वे अब अपने खर्च को नियंत्रित करने के लिए चूल्हा जलाने पर मजबूर हैं. इस कारण स्थानीय बाजार में लकड़ी, कोयला और गोइठा की मांग में भारी उछाल आयी है.

पारंपरिक ईंधन का बढ़ता उपयोग सेहत के लिए चिंताजनक है

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां गोइठा आसानी से उपलब्ध है, वहीं शहरी इलाकों में लोग इसे खरीद कर स्टॉक कर रहे हैं. इससे इन पारंपरिक ईंधनों की कीमतों में भी तेजी देखी जा रही है.विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक ईंधन का बढ़ता उपयोग सेहत के लिए चिंताजनक है. बंद कमरों में कोयला या गोइठा जलाने से निकलने वाला धुआं फेफड़ों की बीमारियों और प्रदूषण को बढ़ावा देता है.

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी मुहिमों का उद्देश्य धुएं से मुक्ति दिलाना था, लेकिन वर्तमान आर्थिक दबाव इस लक्ष्य की राह में बाधा बन रहा है.यह बदलाव उज्ज्वला योजना जैसे स्वच्छ ईंधन अभियानों के लिए एक अस्थायी झटका माना जा रहा है. एक तरफ गैस महंगी है, तो दूसरी तरफ पारंपरिक ईंधन जुटाने में मेहनत और समय अधिक लगता है. इस कारण लोगों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है .शहरों में कई छोटे भोजनालय और रेस्तरां अब कोयले और लकड़ी के चूल्हों पर खाना बना रहे हैं

लकड़ी, गोइठा और कोयला का उपयोग शुरू

तरहसी : गैस की किल्लत के बाद तरहसी इलाके में लोग मिट्टी के चूल्हे, लकड़ी, गोइठा और कोयला का उपयोग शुरू कर दिया है.रसोई गैस को घर तक लाने में हो रही परेशानियों को देखते हुए गैस को घर तक लाने के बजाय पारंपरिक ईंधन का उपयोग करना ही श्रेयस्कर कर समझ रहे हैं. हालांकि पूर्व में ग्रामीण इलाके ही नहीं बल्कि शहरी इलाके में भी लोग लकड़ी ,गोइठा का उपयोग करते थे. लेकिन आधुनिक युग में महिलाओं को रसोई गैस के भरोसे बना दिया गया था. इसलिए वैसे महिलाओं को परेशानी भी हो रही है. पहले मिट्टी से बने चूल्हे में लकड़ी और ग्रामीण ईंधन से भोजन बनाया जाता था. लोगों को उसका स्वाद बेहद पसंद था . आज एक बार फिर से लोग इस परिवेश में लौटने लगे हैं.

पांडू : लकड़ी के चूल्हे और गोइठा पर खाना बनाने को मजबूर

रसोई गैस के किल्लत के बाद प्रखंड क्षेत्र के अधिकतर घरों में लकड़ी के चूल्हे व गोइठा पर खाना बनने लगे हैं. वर्तमान समय में बदलते संसाधन से लगभग सभी घरों में रसोई गैस का उपयोग होता था, जिससे लोग धुआं से बचते हुए आसानी से खाना बना लेते थे.लेकिन अचानक गैस का किल्लत हो जाने से सभी के घरों में परेशानी बढ़ गयी है, लोग किसी तरह पुनः चूल्हा पर खाना बनाने को मजबूर हैं.

छतरपुर: शहरी क्षेत्र में घरों में इंडक्शन से लोग चला रहे हैं काम

घरेलू रसोई गैस की किल्लत ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है. सरकार द्वारा 45 दिन पर मिलने वाले गैस सिलेंडरों से लोगों के घरों के चूल्हे बुझने लगे हैं. प्रखंड क्षेत्र के रसोई गैस उपभोक्ता सिलिंडर की किल्लत के कारण अन्य संसाधनों का उपयोग करने लगे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग लकड़ी कोयले व गोबर की उपलों पर खाना बनाने को मजबूर हो गये हैं. वहीं शहरी क्षेत्र में घरों में इंडक्शन के माध्यम से लोग काम चला रहे हैं. वही जंगल क्षेत्र से बिकने वाले सुख लकड़ी के बोझो की मांग बढ़ गयी है. कुछ ऐसा ही हाल प्रखंड क्षेत्र में संचालित होटलो का भी है. कमर्शियल गैस की डिलीवरी बंद होने के कारण कई होटल ऊंची कीमतों में लकड़ी और कोयले की मदद से काम चला रहे हैं. होटल संचालकों का कहना है कि कमर्शियल गैस सिलेंडर नहीं मिलने के कारण अन्य साधनों से सामग्री बनाने के बाद महंगा पड़ रहा है. जिससे आम तौर पर बिकने वाले मिठाई और नमकीन कीमत बढ़ रही है.

विश्रामपुर: गोइठा के साथ अरहर के डंठल का कर रहे हैं उपयोग

गैस के किल्लत से परेशान लोग अब पारंपरिक ईंधन का सहारा ले रहे हैं. ग्रामीण इलाके में ज्यादातर लोग लकड़ी व गोईठा का उपयोग शुरू कर दिये हैं. जिनके पास लकड़ी नहीं है वैसे लोग गोईठा के साथ रहरेठा व सरसों के डांठ का उपयोग भोजन बनाने में कर रहे हैं.वहीं शहरी क्षेत्र में कई लोग बिजली के हीटर का उपयोग कर रहे हैं. हालांकि बिश्रामपुर नप मुख्यालय में एलपीजी के एचपी गैस का एजेंसी है.जहां ओटीपी प्रक्रिया को अपनाते हुए लोगों को गैस सिलेंडर दिया जा रहा है.इसके अलावा एजेंसी संचालक द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में भी चार पहिया वाहनों से गैस सिलेंडर पहुंचाया जा रहा है.जिस कारण आम लोगों को खास दिक्कत नहीं हो रही है.

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Published by: Akarsh aniket

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