मेदिनीनगर. जैन धर्म के पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के छठे दिन सोमवार को उत्तम संयम धर्म का विधान हुआ. राजस्थान के सांगानेर से पधारे पंडित आदिश जैन शास्त्री ने धार्मिक विधान संपन्न कराया. प्रवचन के दौरान उन्होंने उत्तम संयम धर्म की महत्ता और महिमा का बखान किया. उन्होंने कहा कि यह धर्म व्यक्ति को मन, वचन, काया और पाँच इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा देता है.
मन के विषयों में आसक्ति को कम करना, जीवों की रक्षा करना और किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना ही उत्तम संयम धर्म है. मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में इस धर्म का विशेष महत्व है. जीवन में संयम के बिना तप, पूजा और साधना अधूरी मानी जाती है. जिस प्रकार बिना ब्रेक की गाड़ी दुर्घटना का कारण बनती है, उसी प्रकार बिना संयम का जीवन पतन की ओर चला जाता है. जीवन में क्रोध, मान, माया और लोभ से बचने के लिए संयम धर्म का पालन करना आवश्यक है.
भक्तों ने मनाया धूप दशमी पर्व
जैन मंदिर में रविवार की सुबह में उत्तम संयम धर्म के विधान के दौरान धूप दशमी पर्व मनाया गया.बताया गया कि जैन धर्म के दशलक्षण धर्मों में उत्तम संयम धर्म का विशेष महत्व है. इस धर्म का पालन करते हुए इंद्रियों व मन पर नियंत्रण रखना और विषयों के प्रति आसक्ति को कम करना चाहिये. इस धर्म के अनुपालन से आत्मा को शांति और आत्म-नियंत्रण प्राप्त होता है.
इस धर्म का उद्देश्य आत्मतत्व के शाश्वत सत्य स्वरूप को पहचानना और आध्यात्मिक प्रगति करना है. पंडित आदिश शास्त्री ने बताया कि अपने मन, वचन और कर्म से की जाने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण रखना ही उत्तम संयम है.
इस धर्म का पालन करने से जीवन में सकारात्मकता आती है और यह आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा में सहायक होती है. उत्तम संयम धर्म व्यक्ति को बाहरी दुनिया की चंचलता और इंद्रिय-सुखों से ऊपर उठाकर अपनी आत्मा के आंतरिक स्वरूप को समझने और उस पर विजय प्राप्त करने में मदद करता है.
सुबह में पूजा विधान के दौरान महाबीर प्रसाद, शांति लाल जी बाकलीवाल सपरिवार ने प्रथम अभिषेक एवं ज्ञानचंद जी काला सपरिवार ने शांतिधारा किया. उसके बाद बबिता जैन काला के संगीतमय भजन के साथ दसलक्षण विधान की पूजा की गयी. मौके पर सरस जैन, सागर जैन, बिनय जैन, श्वेता छाबड़ा, राज रारा, मनोज पहाड़िया, अनिल काला, संजय रारा सहित अन्य लोगों ने अपने जीवन को संयमित करने की कामना की.
