भट्टों, ट्रैक्टरों और होटलों में बच्चों से काम, प्रशासन बेखबर

दुर्घटनाओं में जा रही मासूमों की जान, कानून के बाद भी नहीं हो रही कार्रवाई

दुर्घटनाओं में जा रही मासूमों की जान, कानून के बाद भी नहीं हो रही कार्रवाई

राकेश पाठक, मेदिनीनगर

पलामू जिले में बाल मजदूरी का मामला गंभीर रूप लेता जा रहा है. ईंट भट्टों, ट्रैक्टरों और होटलों-ढाबों में बड़ी संख्या में बच्चों से काम कराया जा रहा है, लेकिन श्रम विभाग और जिला प्रशासन इस पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहे हैं. स्थिति यह है कि खुलेआम बाल श्रमिकों से काम कराया जा रहा है और जिम्मेदार अधिकारी बेखबर हैं.

खुलेआम काम कर रहे बाल श्रमिक

चैनपुर प्रखंड परिसर के समीप कब्रिस्तान के पास ट्रैक्टर से ईंट उतारते हुए बाल श्रमिकों को देखा गया. हैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारी उसी रास्ते से गुजरते हैं, लेकिन किसी ने इस पर संज्ञान नहीं लिया. जिले के अधिकांश होटल, रेस्टोरेंट और ढाबों में भी बच्चे काम करते नजर आते हैं.

दुर्घटनाओं में हो रही मौतें

बाल मजदूरी के दौरान कई दर्दनाक हादसे भी सामने आये हैं. नावाबाजार क्षेत्र में ईंट लदा ट्रैक्टर पलटने से 11 वर्षीय श्री भुइयां की मौत हो गयी थी. वहीं तरहसी में अमानत नदी से बालू ढुलाई के दौरान ट्रैक्टर से गिरकर एक स्कूली छात्र अमलेश पासवान की जान चली गयी. इन घटनाओं के बावजूद प्रशासन की सक्रियता नहीं दिख रही है.

कानून है, पर पालन नहीं

बाल श्रम उन्मूलन के लिए सख्त कानून बने हैं, लेकिन पलामू में इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है. यदि जिला प्रशासन छापामारी अभियान चलाये, तो दर्जनों बाल मजदूर विभिन्न स्थानों पर काम करते मिलेंगे. खासकर ईंट भट्टों और होटलों में इनकी संख्या अधिक है.

कार्रवाई के अभाव में बढ़ा मनोबल

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की अनदेखी के कारण बाल मजदूरी कराने वालों का मनोबल बढ़ा हुआ है. कम मजदूरी में बच्चों से काम लिया जाता है और हादसे होने के बाद भी संचालकों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती.

गरीबी और अशिक्षा बना कारण

विशेषज्ञों के अनुसार गरीबी और अशिक्षा के कारण बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं. इससे उनका बचपन प्रभावित हो रहा है और वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं.

पुनर्वास योजनाएं कागजों तक सीमित

बाल श्रम अधिनियम के तहत बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उनके परिवारों को रोजगार, पेंशन व पुनर्वास की व्यवस्था का प्रावधान है. लेकिन जिले में न तो बाल श्रमिकों की पहचान हो रही है और न ही उनके पुनर्वास के लिए ठोस पहल की जा रही है.

जागरूकता और सख्ती की जरूरत

प्रशासनिक उदासीनता और आम लोगों में जागरूकता की कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बाल मजदूरी तेजी से बढ़ रही है. जरूरत है कि प्रशासन सख्त कदम उठाए, नियमित जांच अभियान चलाए और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित करे, ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके.

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Published by: Akarsh aniket

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