सुनील मिंज
पलामू जिले में औसत वर्षा 1000 मिलीमीटर होती है. यहां की भूमि की सतह कठोर एवं अघुलनशील, समतल भूमि से लेकर तीव्र ढाल वाले हैं. मानसून के दौरान पठारी क्षेत्र में अपर्याप्त वर्षा होती है. 75 प्रतिशत से अधिक वर्षा जुलाई से अगस्त के बीच हो जाती है.
इस क्षेत्र में सिंचाई के तरीके बहुत ज्यादा विकसित नहीं हैं. अधिसंख्य नदियां मौसमी हैं; झरना, नहर एवं तालाब बहुत ही कम संख्या में हैं.
जल संग्रहण के तरीकों का प्रचलन भी नहीं. कृषि भूमि की सिंचाई के लिए कुआं एवं मिट्टी के बांध हैं. चट्टानी पठार होने के कारण बोरवेल सफल नहीं होते. मानसून के समय किसान संग्रहित वर्षा जल को ऊंची भूमि (टांड़) की सिंचाई के लिए उपयोग करते हैं. अधिसंख्य किसान की भूमि लाल मिट्टी वाली है. यह किसान छोटे तथा सीमांत होते हैं, जिनके पर्याप्त खाद्य रिजर्व नहीं होते एवं गरमी के आखिरी तथा बरसात की शुरूआत में अर्द्ध भुखमरी की स्थिति में पहुंच जाते हैं.
सूखे की ऐसी स्थिति मेें श्री विधि इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त हो सकती है. श्री विधि में ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती जैसा कि परंपरागत विधि में ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है. श्री विधि में नमी को बनाये रखना ही काफी है.
श्री विधि का प्रयोग पिछले सालों मेें पलामू जिले के दो प्रखंडों छतरपुर एवं मनातू में किया गया था. प्रयोगात्मक चरण में 29 गांवों से कुल 108 किसानों द्वारा श्री विधि से 4.47 एकड़ भूमि में धान की फसल उगाई गयी थी.
इस विधि से खेती के लिए भूमि के प्रकार के अनुसार धान के किस्मों का चयन किया गया. मुख्य किस्मों में बनारसी, मंसूरी, सीरजू-52, पंत-4, एवं सीता, जो नीची भूमि पर खेती की जाने वाली किस्में हैं. उंची भूमि में मुख्य किस्मों में आईआर-36, आईआर-64, जया, सोनम एवं सीता हैं. ये सभी किस्में उच्च उत्पादकता वाली किस्में हैंं.
छतरपुर प्रखंड के हुलसम निवासी जनेश्वर सिंह ने बताया कि श्री विधि के लिए खेत की तैयारी परंपरागत विधि की तरह ही होती है. 15 दिन के बिचड़े को मुख्य खेत मे लगाया जाता है. श्री विधि द्वारा खेत में जल के स्तर को बनाये रखा जाता है. प्लास्टिक की रस्सी एवं बांस के डंडे तथा धातु के मार्कर का उपयोग सही ढंग से पौधा रोपण के लिए प्रयोेग किये जाते है. परंपरागत स्रोत द्वारा जल प्रबंध किया जाता है.
मनातू अब्दुलडीह के बैशाखी उरांव ने बताया कि खेती की परंपरागत विधि में 45 किलो प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है, जबकि श्री विधि में औसतन दो किलो ही बीज की आवश्यकता होती है. पौधा रोपण के समय बिचड़ा की उम्र परंपरागत विधि में 25-30 दिनों की होती है जबकि श्री विधि में पौधा रोपण का समय 12-15 दिनों का होता है.
हम परंपरागत तरीके में पौधा रोपण अंदाज से करते हैं जबकि श्री विधि में इसकी दूरी 25×25 इंच की होती है. उन्होंने बताया कि पुरानी विधि में निकाई गुड़ाई मैनुअल तरीके से की जाती है जबकि आधुनिक तरीके में धातु के वीडर के द्वारा. पैदावार का बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि परंपरागत खेती के तरीके में प्रति एकड़ 15 क्विंटल धान की उपज होती है जबकि श्री विधि में 22 क्विंटल. परंपरागत एवं श्री दोनों विधियों के तुलनात्मक मूल्यांकन दौरान पाया गया कि श्री विधि परंपरागत विधि से कई गुना अच्छी है.
निष्कर्ष से यह पता चला कि श्री विधि के माध्यम से कम लागत खर्च तथा उच्च उत्पादकता प्राप्त होती है. परंपरागत विधि से किसान सिर्फ 5-6 महीने के लिए ही अनाज का उत्पादन करते थे अब वे श्री के माध्यम से 8-10 महीनों के लिए अनाज का उत्पादन कर रहे हैं. अब किसान लंबे समय के लिए खाद्य संरक्षित कर सकते हैं. फसल उत्पादन में वृद्धि पलायन को रोकने में सफल होगी. श्री में कम लागत खर्च की वजह से वे अब पैसे की भी बचत कर रहे हैं. उस पैसे का उपयोग पारिवारिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जा रहा है.
ज्ञात हो कि मशहूर वृत्तचित्र निर्माता मेघनाथ और बीजू टोप्पो धान रोपण की इस विधि पर फिल्म बना चुके हैं. इस क्षेत्र में कार्यरत समाजकर्मी जवाहर मेहता ने बताया कि नई विधियां जैसे मार्किग, लाइनिंग, कम जलस्तर बनाये रखना, एक पौधा लगाना और वीडिंग के औजार किसानों के लिए चुनौतियां थे. इसके बावजूद कुछ किसान इस विधि से धन की खेती कर रहे हैं. दूसरे किसानों को भी इस विधि से खेती करना चाहिए.
