मेदिनीनगर : खत्म हुआ भय, निकला विश्वास और विकास का सूर्य, गांव लौट रहे लोग
अजीत मिश्रा, मेदिनीनगर : आ अब घर लौट चलें…, कुछ ऐसा ही हुआ है. आज के दौर में यकीन कर पाना मुश्किल है. लोग कहते हैं कि खेती किसानी अब लाभ का सौदा नहीं है. बड़ी मुश्किल होती है, पर अपना गांव हो, पास में जमीन हो और मेहनत करने का जज्बा हो, तो यकीन […]
मेदिनीनगर : खत्म हुआ भय, निकला विश्वास और विकास का सूर्य, गांव लौट रहे लोग
अजीत मिश्रा, मेदिनीनगर : आ अब घर लौट चलें…, कुछ ऐसा ही हुआ है. आज के दौर में यकीन कर पाना मुश्किल है. लोग कहते हैं कि खेती किसानी अब लाभ का सौदा नहीं है. बड़ी मुश्किल होती है, पर अपना गांव हो, पास में जमीन हो और मेहनत करने का जज्बा हो, तो यकीन मानिये बहुत कुछ बदल सकता है.
इसी बदलाव की कहानी गढ़ रहे है हरिहरगंज के सरसोत गांव के शेर बब्बर सिंह. जो 23 वर्षों के बाद अपने गांव लौट आये हैं. वह बाहर काम करते थे. इच्छा होती थी गांव आने की. लेकिन उम्मीद छोड़ चुके थे. उम्मीद टूटने का कारण था भय का वातावरण. हरिहरगंज का सरसोत इलाका उग्रवादियों के कब्जे में था.
या यूं कहे कि यहां माओवादियों की समांतर सरकार चल रही थी, तो कोई गलत नहीं. वातावरण ऐसा बन चुका था, जिसमें लोगों ने उम्मीद छोड़ दी थी कि कभी वह गांव लौटेंगे.
लेकिन असंभव दिखने वाला काम संभव हुआ. अब वही गांव जहां पहले गये वर्षों हो गये थे, वहां सामान्य जीवन बहाल हो गयी और शहर में काम कर रहे शेर बब्बर लौटकर न सिर्फ खेतीबारी कर रहे हैं. बल्कि शहर से ज्यादा अपने गांव में सुकून महसूस कर रहे हैं.
शेर बब्बर की कहानी सुनकर आपके मन में यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि आखिर यह हुआ कैसे. शेर बब्बर की कहानी तो एक बानगी मात्र है. हरिहरगंज के पथरा इलाके में पिकेट का खुलना इलाके में सूरज उगने के समान था. जैसे भय का वातावरण दूर होकर सुरक्षा का माहौल कायम हो गया. पुलिस लोगों को विश्वास दिलाने में सफल रही.
अब यहां आप सुकून से रह सकते हैं. इसमें पलामू पुलिस अधीक्षक इंद्रजीत माहथा की भूमिका काफी अहम रही है. उन्होंने न सिर्फ लोगों को विश्वास में लिया. बल्कि स्वयं गांव का दौरा कर लोगों को प्रेरित किया. सुरक्षा का भरोसा दिलाया. जिस पर लोगों ने यकीन किया और वातावरण बदल गया.
गांव के शारदुल सिंह मेदिनीनगर में एक विद्यालय में शिक्षक है. उनकी माने तो उनलोगों का कनेक्शन गांव से पूरी तरह से कट गया था. 1994 में उग्रवाद के कारण वे लोग गांव छोड़ कर शहर में चले आये थे. क्योंकि उसी समय उग्रवादियों ने पूर्व सरपंच अलखदेव सिंह की हत्या कर दी थी. कब किसके साथ क्या हो जाये, यह कोई कह नहीं पाता. भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ आयोजन में कुलदेवता की पूजा की परंपरा रही है.
लेकिन भय के कारण लोग इससे भी वंचित रह जाते थे. शारदुल का कहना है कि उनकी शादी वर्ष-2004 में हुई थी. मगर शादी के तुरंत बाद गांव जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाये थे. शादी के आठ वर्षों के बाद किसी तरह हिम्मत जुटा कर गांव गये थे. मगर मुश्किल से वहा पांच मिनट ठहरे होंगे. जब तक वापस मेदिनीनगर नहीं आये, तब तक राहत नहीं थी.
जून 2017 में पिकेट बनने के बाद वे लोग इत्मीनान से अब गांव जा रहे हैं. बच्चे को साथ लेकर जाते है. कभी कभार रात भी गुजारते हैं. खेतीबारी होने लगी गांव में पुन: पुराना वातावरण कायम हो चुका है. अब बड़े अधिकारी गांव जाते हैं. सबकी खेती होने लगी. सैकड़ों एकड़ में खेतों हो रही है. निश्चित तौर पर वातावरण बदलने के बाद इस गांव में रहने वाले लोग जाते हैं, तो उनके लिए यह सब कुछ एक सपना सच होने जैसा है.
फैक्टशीट
झारखंड व बिहार के सीमा पर बसा है सरसोत पंचायत
पथरा में हुई है पिकेट की स्थापना, अब बना ओपी
शुरू हो गयी खेती-बारी
आठ जनवरी को डीजीपी डीके पांडेय ने किया था रात्रि प्रवास
नौ जनवरी को लगा था जनता दरबार
क्या कहते हैं एसपी
एसपी इंद्रजीत माहथा का कहना है कि ओपी और पिकेट की स्थापना का मुख्य उद्देश्य न्याय आधारित व्यवस्था को स्थापित करना. जहां मानवीय व न्यायपूर्ण दृष्टिकोण रखते हुए निर्णय लिये जाये. निश्चित तौर पर पिकेट व ओपी का स्थापना होने से भय का वातावरण दूर हुआ है.
लोग गांव की तरफ लौटे हैं. इसके साथ-साथ एक महत्वपूर्ण बात है कि समरसता का माहौल भी स्थापित हुआ है. यह समरसता का माहौल परस्पर सम्मान पर आधारित है. इसलिए पुलिस की भी यह कोशिश है कि इलाके में मानवीय व न्यायपूर्ण पक्ष को देखते हुए कार्य करें, ताकि बेहतर वातावरण कायम रहे.