उज्ज्वला योजना का सच. रिफिलिंग में आर्थिक तंगी बनी बाधक
पाकुड़ : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस उद्देश्य से प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत गरीब परिवारों के बीच मुफ्त गैस वितरण करने का काम किया था, आज उस पानी फिरता नजर आ रहा है. प्रधानमंत्री का सपना था कि ग्रामीण क्षेत्र की गरीब महिलाओं को चूल्हा फूंकना नहीं पड़े और वे भी गैस में ही कम खर्च पर बिना धुंए के शिकार हुए समय पर खाना पका सके. जिले भर की अगर बात करें तो पाकुड़ जिला में वर्ष 2019 तक कुल 1 लाख 39 हजार 629 लाभुकों के बीच प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत गैस का वितरण किये जाने का लक्ष्य रखा गया है. जिसमें अब तक 35048 लाभुकों के बीच गैस कनेक्शन का वितरण किया जा चुका है. ग्रामीण क्षेत्रों में खास कर पूरे उत्साह के साथ गरीब परिवार के महिलाओं ने इस योजना का शुरुआती दौर में लाभ लिया. सरकार की ओर से मुहैया कराये गये गैस कनेक्शन पहली बार घरों में मिलने के बाद भले ही लाभुक उत्साहित हुए,
परंतु अधिकांश परिवार दूसरी बार आर्थिक समस्या को सामने रखते हुए सिलिंडर में गैस नहीं भरवा सके. इस कारण प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत मिले गैस कनेक्शन को लाभुकों ने अपने घर के किसी कोने में रख कर पुन: चुल्हा का ही सहारा लेना उचित समझा. स्पष्ट है कि भले ही प्रधानमंत्री ने अच्छी सोच के साथ इस योजना का शुरूआत किया हो, परंतु प्रथम बार उपयोग के बाद ही अधिकांश लाभुक इसका उपयोग करना बंद कर दिया है. प्रभात खबर की टीम ने जब इसे लेकर पड़ताल किया तो ऐसे कई मामले सामने आये जहां उज्जवला योजना के तहत मिले चूल्हे व सिलिंडर घर के किसी कोने में पड़े थे और उसी घर में खाना पकाने के लिए महिलाएं चूल्हा फूंकते नजर आयी. ऐसे परिवारों का कहना था कि एकमुश्त सिलिंडर भरवाने में 800 रुपये करीब लग जाता है जो उनके लिए काफी मंहगा है.
