17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है. इस मौके पर पिछले करीब 12 वर्षों में स्वच्छता और सफाई कर्मचारियों से जुड़ी केंद्र सरकार की प्रमुख पहलों को देखना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्वच्छता का सवाल केवल साफ शहरों और गांवों तक सीमित नहीं है. इसके केंद्र में वे लाखों श्रमिक भी हैं, जो सीवर, सेप्टिक टैंक, कचरा प्रबंधन और सफाई व्यवस्था को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
वाल्मीकि समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से सफाई कार्य से जुड़ा रहा है. ऐसे में स्वच्छता क्षेत्र में बदलाव की नीतियों का इस समाज पर सीधा सामाजिक और आर्थिक असर पड़ता है.
Read more: BRICS 2026: विरोधाभासों का मंच क्यों बना दिल्ली शिखर सम्मेलन? जानिए दोस्त कौन, प्रतिद्वंद्वी कौन?
स्वच्छ भारत मिशन से बदली स्वच्छता की तस्वीर
2 अक्टूबर 2014 को शुरू हुआ स्वच्छ भारत मिशन स्वच्छता को राष्ट्रीय अभियान के रूप में सामने लाने वाली बड़ी पहल थी. इसके शुरुआती उद्देश्यों में खुले में शौच की समाप्ति, अस्वच्छ शौचालयों का रूपांतरण, मैनुअल स्कैवेंजिंग के उन्मूलन और ठोस कचरा प्रबंधन जैसे लक्ष्य शामिल थे.
इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि सफाई को केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी मानने के बजाय नागरिक भागीदारी और व्यवहार परिवर्तन से जोड़ा गया.
लेकिन स्वच्छता अभियान की सफलता का दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—जो लोग देश को साफ रखते हैं, उनकी सुरक्षा कितनी सुनिश्चित हुई?
सीवर सफाई में मशीनों पर जोर
इसी सवाल के जवाब में National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem यानी NAMASTE योजना सामने आई. इसका उद्देश्य सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई में मानवीय जोखिम को कम करना, मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ाना और श्रमिकों को सुरक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा से जोड़ना है.
योजना के तहत श्रमिकों की पहचान और प्रोफाइलिंग, सुरक्षा प्रशिक्षण, PPE किट, स्वास्थ्य कवरेज तथा स्वच्छता से जुड़े उपकरण खरीदने के लिए सहायता जैसे प्रावधान किए गए हैं.
दिसंबर 2025 तक 89,114 सीवर एवं सेप्टिक टैंक श्रमिकों का सत्यापन किया गया था. इनमें झारखंड के 1,115 श्रमिक शामिल थे. उसी आंकड़े के अनुसार 73,864 श्रमिकों को आयुष्मान भारत, राज्य स्वास्थ्य योजनाओं या NAMASTE के तहत स्वास्थ्य कवरेज मिला था.
इसके बाद आंकड़ा और बढ़ा. अगस्त 2026 में सरकार ने बताया कि NAMASTE के तहत देशभर में 89,915 श्रमिक सत्यापित किए जा चुके हैं.
झारखंड में मजदूरी से उद्यमिता की ओर रास्ता
स्वच्छता क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण विचार है—सफाई कर्मचारी केवल मजदूरी करने वाले श्रमिक न रहें, बल्कि आधुनिक स्वच्छता सेवाओं के उद्यमी भी बन सकें.
स्वच्छता उद्यमी योजना के तहत सफाई कर्मचारियों और लक्षित समूहों को स्वच्छता से जुड़े वाहनों और उपकरणों की खरीद के लिए वित्तीय सहायता देने का प्रावधान किया गया था. इसमें जेटिंग एवं सक्शन मशीन, वैक्यूम लोडर और कचरा संग्रहण जैसे उपकरण शामिल हैं.
NAMASTE के तहत भी sanitation enterprises और स्वच्छता से जुड़े उपकरणों की खरीद के लिए capital subsidy का प्रावधान रखा गया है. इसका उद्देश्य श्रमिकों और उनके आश्रितों के लिए वैकल्पिक आजीविका के रास्ते खोलना है.
स्वास्थ्य सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा
सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में संक्रमण, जहरीली गैस और अन्य व्यावसायिक जोखिम होते हैं. इसलिए सुरक्षा उपकरण और स्वास्थ्य बीमा इस क्षेत्र की नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर 2025 तक सत्यापित श्रमिकों में से 73,864 को विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के तहत कवरेज मिला था.
लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई
इन पहलों के बावजूद सफाई कर्मचारियों की स्थिति का आकलन केवल सरकारी योजनाओं की संख्या से नहीं किया जा सकता. स्थानीय निकायों में रोजगार की प्रकृति, संविदा व्यवस्था, वेतन, सुरक्षा मानकों का पालन और सामाजिक भेदभाव जैसी चुनौतियां अभी भी चर्चा का विषय हैं.
सरकारी आंकड़े स्वयं यह बताते हैं कि mechanisation के कारण श्रमिकों की आय में औसत वृद्धि का कोई व्यवस्थित आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है. साथ ही, सरकार ने अभी mechanisation से productivity बढ़ने को मापने वाले स्पष्ट indicators भी निर्धारित नहीं किए हैं.
यानी अगला सवाल केवल यह नहीं है कि कितने श्रमिक योजना से जुड़े, बल्कि यह भी है कि उनकी आय, सुरक्षा और सामाजिक स्थिति में कितना वास्तविक बदलाव आया.
वाल्मीकि समाज के युवाओं के लिए अगली चुनौती
पिछले 12 वर्षों की पहलों को एक व्यापक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है—स्वच्छता को राष्ट्रीय प्राथमिकता देने से लेकर सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता उद्यमिता तक.
अब वाल्मीकि समाज के सामने अगला अवसर शिक्षा, कौशल, सरकारी सेवा, प्रशासन, कानून और उद्यमिता में व्यापक भागीदारी बढ़ाने का है.
स्वच्छ भारत की कहानी केवल साफ सड़कों और शौचालयों की कहानी नहीं है. इसकी असली कसौटी यह भी है कि भारत को साफ रखने वाले श्रमिकों का जीवन कितना सुरक्षित, सम्मानित और आत्मनिर्भर बनता है.
झारखंड फैक्ट फाइल
- NAMASTE के तहत झारखंड में सत्यापित श्रमिक: 1,115
- देशभर में सत्यापित श्रमिक: 89,915 — अगस्त 2026 तक
- दिसंबर 2025 तक राष्ट्रीय आंकड़ा: 89,114
- NAMASTE का प्रमुख फोकस: mechanised sanitation, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा
- स्वच्छता उद्यमिता: sanitation-related machinery और enterprises को बढ़ावा
- स्वास्थ्य सुरक्षा: Ayushman Bharat और अन्य स्वास्थ्य योजनाओं से जोड़ने का प्रयास
लेखक: गोविंदा बाल्मीकि, आईटी सेल संयोजक, भाजपा एससी मोर्चा, झारखंड
Read more: Viral 80's trend: '1980-1989'- वो 10 साल जिन्होंने आज का भारत बनाया
